सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1060 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1भक्त सदैव प्रभु-प्रेम में लीन रहता है और प्रभु स्वयं ही कृपा करके भक्ति करवाता है॥ ६॥

2इस शरीर में मन भटकता रहता है और

3पुआल जैसी व्यर्थ माया के लिए आत्मिक सुख को त्याग कर महा दुख प्राप्त करता है।

4सतिगुरु से साक्षात्कार किए बिना कोई भी सुख का ठिकाना नहीं पा सकता है और परमात्मा स्वयं ही यह लीला करवाता है॥ ७॥

5ईश्वर स्वयं ही अपरंपार है, स्वयं ही विचारवान् है और

6स्वयं ही जीव से शुभ-कर्म करवा कर मिला लेता है।

7यह जीव बेचारा कोई कार्य क्या कर सकता है, ईश्वर स्वयं ही अनुकंपा करके उसे अपने साथ मिला लेता है॥ ८॥

8वह स्वयं ही जीव को पूर्ण सतिगुरु से मिला देता है और

9उसे सच्चे शब्द द्वारा महाबली शूरवीर बना देता है।

10वह स्वयं ही मिलाकर बड़ाई प्रदान करता है और जीव का चित सत्य से लगा देता है।॥ ९॥

11हृदय-घर में वह परम-सत्य ही विद्यमान है और

12कोई विरला गुरुमुख ही इस रहस्य को बूझता है।

13जिसके ह्रदय में नाम रूपी भण्डार बस गया है, उसकी रसना नाम का ही भजन करती रहती है॥ १०॥

14सत्य की खोज में मानव देश-देशान्तर भटकता रहता है किन्तु अपने अन्तर्मन में खोज नहीं करता।

15माया-मोह में बंधा हुआ वह यमकाल के शिकंजे में आ जाता है।

16वह द्वैतभाव में भटकता रहता है और उसकी यम की फाँसी कभी नहीं टूटती॥ ११॥

17तब तक कोई जप, तप, संयम एवं कोई अन्य उपाय उसका कल्याण नहीं कर सकता

18जब तक मनुष्य गुरु के शब्द अनुरूप आचरण नहीं अपनाता,

19जिसे गुरु के शब्द द्वारा सत्य मिल गया है, वह परम-सत्य में ही विलीन हो गया है॥ १२॥

20संसार में काम-क्रोध बहुत बली है,

21जीव अनेक धर्म-कर्म करता रहता है किन्तु यह सब दुखों का ही प्रसार है।

22जो सतिगुरु की सेवा करते हैं, वही सुख पाते हैं और गुरु उन्हें सच्चे शब्द द्वारा परमात्मा से मिला देता है। १३॥

23यह शरीर पवन, पानी, अग्नि से बना हुआ है और

24माया का मोह सब जीवों के भीतर कार्यशील है।

25जिसने पंच तत्वों से पैदा किया है, जब जीव उस रचनहार को पहचान लेता है तो उसका माया-मोह दूर हो जाता है॥ १४॥

26कई जीव माया मोह में अभिमानी बने रहते हैं और

27अहंकार के कारण अपने आप ही सब कुछ बन बैठते हैं।

28जिस व्यक्ति को यमकाल की खबर नहीं हुई, वह अंतकाल जगत् में से पछताता ही गया है॥ १५॥

29जिसने उत्पन्न किया है, वही युक्ति को जानता है।

30गुरु जिसे शब्द देता है, वह पहचान लेता है।

31दास नानक विनती करता है कि वह अपना चित सत्य-नाम में ही लगाता है॥ १६॥ २॥ १६॥

32मारू महला ३॥

33सृष्टि-रचना से पूर्व एवं युगों के प्रारम्भ में दयालु दाता (परमात्मा) ही है,

34जिसे पूर्ण गुरु के शब्द द्वारा ही भक्तों ने पहचाना है।

35हे परमेश्वर ! जो तेरी उपासना करते हैं, वे तुझ में ही समा जाते हैं और तू स्वयं ही उन्हें अपने साथ मिलाता है॥ १॥

36तू जीवों की पहुँच से परे एवं इन्द्रियातीत है और किसी ने भी तेरी कीमत नहीं ऑकी।

37सभी जीव-जन्तु तेरी ही शरण में हैं।

38जैसे तू चाहता है, वैसे ही जीवों को चलाता है और तू स्वयं ही सन्मार्ग प्रदान करता है॥ २॥

39अब भी परम-सत्य निरंकार ही है और भविष्य में भी वही रहेगा।

40वह स्वयं ही बनाने वाला है, अन्य कोई समर्थ नहीं।

41सुख देने वाला परमात्मा सबकी देखरेख करता है और स्वयं ही रिजक पहुँचाता है॥ ३॥

42हे अगम्य, अगोचर, अलख-अपार !

43कोई भी तेरा आर-पार नहीं जानता।

44तू स्वयं ही अपने आपको पहचानता है और गुरु उपदेश द्वारा ही अपने बारे में ज्ञान प्रदान करता है॥ ४॥

45हे निरंकार ! समूचे पातालों, पुरियों एवं लोकों में, इसमें तेरा ही सख्त हुक्म चल रहा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं