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गुरु ग्रंथ साहिब 105 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji

1हे प्रभु ! कृपा करके मुझे अपनी भक्ति में लगा लो जिससे हे नानक ! वह प्रभु के सत्य नाम रूपी अमृत का पान करता रहे॥ ४ ॥ २८ ॥ ३५ ॥

2माझ महला ५ ॥

3सृष्टि का स्वामी गोविन्द गुसाई समस्त जीवों पर ऐसे दयालु हो गया है जैसे

4बादल समस्त स्थानों पर वर्षा करता है,

5सृष्टिकर्ता सदैव ही दीनदयालु एवं कृपालु है और उसने अपने भक्तों के हृदय शीतल कर दिए हैं। १ ॥

6प्रभु अपने जीव-जन्तुओं की पालना ऐसे करता है।

7जैसे माता अपने शिशु की देखभाल करती है

8भगवान दुखनाशक एवं सुखों का सागर है। वह समस्त जीवों को खाने के लिए भोजन देता है॥ २॥

9दयालु परमात्मा जल एवं धरती में सर्वत्र समाया हुआ है।

10मैं सदैव उस पर बलिहारी व कुर्बान जाता हूँ।

11दिन-रात हमें सदैव ही उस भगवान का ध्यान करना चाहिए जो एक क्षण में ही सभी का उद्धार कर देता है॥ ३॥

12भगवान ने स्वयं ही अपने भक्तों की रक्षा की है

13और उनके सभी दुःख एवं संताप दूर हो गए हैं।

14हे नानक ! भगवान जब कृपा-दृष्टि से देखता है तो उसका नाम-सिमरन करने से मनुष्य का मन एवं तन हरा-भरा हो जाता है॥ ४॥ २६॥ ३६॥

15माझ महला ५ ॥

16हे प्रियतम प्रभु ! जिस स्थान पर तेरे नाम का जाप किया जाता है,

17वह स्थान स्वर्ण के चौबारे के तुल्य है।

18हे मेरे गोबिन्द ! जिस स्थान पर तेरे नाम का जाप नहीं किया जाता, वह नगर वीरान भूमि के तुल्य है॥१॥

19जो व्यक्ति रूखी-सूखी रोटी खा कर भगवान का सिमरन करता रहता है,

20उसे भगवान घर एवं बाहर सर्वत्र कृपा-दृष्टि से देखता रहता है।

21जो व्यक्ति भगवान के दिए पदार्थ खा-खाकर दुष्कर्म करता रहता है, उसे विष की वाटिका समझो ॥ २ ॥

22जो व्यक्ति संतों से प्रेम नहीं करता

23और शाक्तों के साथ मिलकर दुष्कर्म करता है,

24ऐसा ज्ञानहीन व्यक्ति अपने दुर्लभ जन्म को व्यर्थ गंवा रहा है तथा वह अपनी जड़ को स्वयं ही उखाड़ रहा है॥ ३॥

25हे दीनदयाल ! मैं तेरी शरण में आया हूँ।

26हे मेरे गुरु गोपाल ! तू सुखों का सागर है।

27मुझ पर कृपा करो। नानक तेरी ही महिमा गायन करता है। मेरी लाज-प्रतिष्ठा रखो ॥४॥३०॥३७॥

28माझ महला ५ ॥

29जब भगवान के सुन्दर चरण मेरे हृदय में स्थित हो गए तो

30मेरे तमाम दुःख एवं संताप नाश हो गए।

31संतों की संगति में निवास होने से मेरे अन्तर्मन में अनहद शब्द की मधुर ध्वनि उत्पन्न हो गई और मन में शांति एवं सहज सुख उपलब्ध हो गया है॥ १॥

32भगवान से ऐसी प्रीति लगी है, जो कदापि नहीं टूटती।

33भगवान मेरे अन्दर व बाहर सर्वत्र व्यापक हो रहा है।

34भगवान का सदैव नाम-सिमरन करने तथा उसकी महिमा-स्तुति द्वारा मेरी मृत्यु की फाँसी कट गई है।॥२॥

35मेरे मन में अनहद शब्द के प्रगट होने से हरि रस रूपी अम्रित वर्षा होने लग गई है ।

36मेरे मन एवं तन मैं शांति प्रवेश कर गई है ।

37हे भगवान ! सतगुरु ने तेरे भक्तो को आश्वासन दिया है और हरि रस रूपी अमृत का पान करवाकर उन्हें तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया है॥३॥

38जिस भगवान का मैं सेवक था, उससे मैंने अपनी की हुई सेवा का फल पाया है।

39सतिगुरु ने कृपा करके मुझे भगवान से मिला दिया है।

40हे नानक ! सौभाग्य से मेरा जन्म-मरण का चक्र मिट गया है और भगवान से मिलन की कामना पूरी हो गई है॥ ४ ॥ ३१ ॥ ३८ ॥

41माझ महला ५ ॥

42वर्षा हुई है, इसे परमेश्वर ने ही बरसाया है।

43इससे प्रभु ने समस्त जीव-जन्तुओं को सुखी बसा दिया है।

44हरि-परमेश्वर के नाम का सिमरन करने से उनकी पीड़ा दूर हो गई है और उनको सच्चा सुख मिल गया है ॥१॥

45ये जीव-जन्तु जिस परमात्मा के उत्पन्न किए हुए हैं, उसने ही उनकी रक्षा की है।

46पारब्रह्म-परमेश्वर उनका रक्षक बन गया है।

47मेरे ठाकुर जी ने मेरी प्रार्थना सुन ली है और मेरी भक्ति सफल हो गई है॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं