गुरु ग्रंथ साहिब 1059 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1जो गुरुमुख होता ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
2वह मन में से अभिमान, माया एवं भ्रम को दूर कर देता है।
3गुरु रूपी सीढ़ी सबसे ऊँची एवं श्रेष्ठ है और गुरु सत्य के दर पर प्रभु के गुण गाता रहता है॥७॥
4गुरमुख वह सत्य एवं संयम वाला जीवन-आचरण अपनाता है और
5उसे मोक्ष-द्वार प्राप्त हो जाता है
6प्रेम-भक्ति के रंग में सदा लीन रहता है और अहम् को मिटाकर सत्य में समाहित हो जाता है॥८॥
7जो गुरुमुख होता है, वह मन को खोजकर नाम के बारे में दूसरों को सुनाता है।
8वह सदा ही सत्य नाम में लगन लगाता है।
9जो परमात्मा को मंजूर है, वह वही करता है और जो सच्चे के मन को अच्छा लगता है॥ ९॥
10यदि उसे स्वीकार हो तो वह सतगुरु से मिला देता है।
11यदि उसे उपयुक्त लगे तो मन में नाम बसा देता है।
12वह स्वेच्छा में सदा ही रंग में लीन रहता है और स्वेच्छा से मन में आ बसता है॥ १०॥
13जो व्यक्ति मन के हठ से कर्म करता है, वह बर्बाद हो जाता है।
14नेक दिखावे करने से भी उसका मन प्रभु-रंग में नहीं भीगता।
15वह विषय-विकारों में लीन रहकर दुख ही भोगता है और दुखों में ही समा जाता है॥ ११॥
16जो गुरुमुख होता है, वह सुख ही हासिल करता है और
17उसे जीवन-मृत्यु का ज्ञान हो जाता है।
18जो जीवन-मृत्यु को बराबर समझता , वही जीव मेरे प्रभु को अच्छा लगता है॥ १२॥
19जो गुरुमुख बनकर मृत्यु को प्राप्त होता है, वही ईश्वर को परवान होता है।
20वह जन्म एवं मृत्यु को भी ईश्वर का हुक्म ही मानता है।
21वह न ही मरता है, न ही जन्म लेता है, न ही दुख प्राप्त करता है, अपितु उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है॥ १३॥
22वही खुशकिस्मत हैं, जिन्होंने सच्चे गुरु को पाया है।
23उन्होंने मन में से अभिमान एवं मोह को दूर कर दिया है।
24उनका मन निर्मल हो जाता है, फिर उन्हें अहम् की मैल नहीं लगती और वे सच्चे द्वार पर ही शोभा प्राप्त करते हैं॥ १४॥
25करने एवं करवाने वाला स्वयं ईश्वर ही है।
26वह स्वयं ही देखभाल करता और बनाकर मिटा भी देता है।
27गुरुमुख की सेवा ही मेरे प्रभु को अच्छी लगती है और वह सत्य को सुनकर ही उसे परवान कर लेता है॥ १५॥
28गुरुमुख सच्चा जीवन-आचरण अपनाता है,
29वह निर्मल ही रहता है और उसके मन को कोई मैल नहीं लगती।
30हे नानक ! हरि-नाम में रत चिंतनशील प्रभु-नाम में ही विलीन हो जाता है॥१६॥१॥१५॥
31मारू महला ३॥
32ईश्वर ने स्वयं ही अपने हुक्म से समूची सृष्टि का निर्माण किया है और
33स्वयं ही सब बनाया एवं नष्ट किया है।
34वह सत्यस्वरूप सबके साथ न्याय करता है और सत्यवादियों को सत्य से मिला देता है॥ १॥
35यह शरीर किला आकार है,
36जिसमें माया का मोह फैला हुआ है।
37शब्द के बिना यह भस्म की ढेरी है और मिट्टी में ही मिल जाता है।॥ २॥
38यह कंचन शरीर अपार किला है,
39जिसमें अपार ब्रह्म-शब्द रमण कर रहा है।
40गुरुमुख सदा सच्चे प्रभु के गुण गाता रहता है और अपने प्रियतम से मिलकर सुख हासिल करता है।३॥
41यह शरीर ही परमात्मा का मन्दिर है और वह स्वयं ही इसे सुन्दर बनाता है।
42इस मन्दिर में परमात्मा ही रहता है।
43नाम के व्यापारी गुरु के शब्द द्वारा व्यापार करते हैं और प्रभु कृपा कर उन्हें मिला लेता है॥ ४॥
44वही शुद्ध है, जो अपने क्रोध को दूर कर देता है।
45वह शब्द द्वारा बूझकर खुद को सुन्दर बना लेता है।
46दरअसल करने-करवाने वाला स्वयं परमात्मा ही है और स्वयं ही नाम मन में बसा देता है।॥ ५॥
47निर्मल भक्ति वेिलक्षण है,
48इसमें शब्द का मनन करने से मन-तन शुद्ध हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं