गुरु ग्रंथ साहिब 1058 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1सच्चे नाम का कार्य सदा आनंददायक है और शब्द के बिना कार्य कैसे साकार हो सकता है॥ ७॥
2मनुष्य पल में ही हँसने लग पड़ता है और पल में ही रोने लगता है अर्थात् खुशी एवं गम महसूस करता है।
3द्वैतभाव-दुर्मति के कारण उसका कार्य सिद्ध नहीं होता।
4संयोग एवं वियोग ईश्वर ने पूर्व से ही लिख दिया है और भाग्य बदलने से भी बदला नहीं जा सकता॥ ८॥
5जो शब्द-गुरु के अनुसार आचरण अपनाता है, उसे ही जीवन-मुक्ति प्राप्त होती है।
6ऐसा व्यक्ति सदैव ईश्वर में लीन रहता है।
7गुरु की कृपा से ही उसे लोक-परलोक में बड़ाई मिलती है और उसे अभिमान का रोग नहीं लगता॥९॥
8जो व्यक्ति मीठे -नमकीन व्यंजन खाकर अपना शरीर बढ़ाता है,
9वह अनेक आडम्बर करता है, परन्तु शब्द-गुरु के अनुसार आचरण नहीं करता।
10उसके अन्तर्मन में रोग एवं महा दुख लग जाता है और अन्त में वह विष्ठा में ही गल-सड़ जाता है। १०॥
11जो व्यक्ति वेदों का अध्ययन करता है और तदन्तर वाद-विवाद की बातें करता रहता है।
12ब्रहा तो हृदय में ही है किन्तु वह शब्द द्वारा उसकी पहचान नहीं करता।
13जो गुरुमुख होता है वही परम-तत्व का मंथन करता है और उसकी रसना हरि-नाम रस का पान करती रहती है। ११॥
14जो मनुष्य हृदय-घर में मौजूद नाम रूपी वस्तु को छोड़कर बाहर भटकता रहता है,
15ऐसे अन्धे मनमुखी को नाम का स्वाद प्राप्त नहीं होता।
16उसकी रसना अन्य रसों में लीन होकर रुक्ष बोलती है और हरि-नाम रस का उसे बिल्कुल स्वाद नहीं मिलता॥ १२॥
17मनमुख जीवात्मा का स्वामी भ्रम है और
18वह दुर्मति के कारण मरती एवं नित्य ही ख्वार होती है।
19वह अपना मन काम, क्रोध एवं द्वैतभाव में लगा लेती है, जिससे उसे सपने में भी सुख हासिल नहीं होता।॥ १३॥
20जो जीवात्मा कंचन सरीखी है, उसका स्वामी शब्द है।
21वह प्रभु के प्रेम में लीन होकर नित्य भोग भोगती है।
22यदि कोई अन्य जीव के शरीर रूपी महल में प्रभु का दसम द्वार प्राप्त कर ले तो वह ईश्वरेच्छा को समझ कर उस में ही लीन हो जाती है॥ १४॥
23वह दातार स्वयं ही देता रहता है और
24उसके आगे किसी का कोई उपाय नहीं चल सकता।
25वह स्वयं ही क्षमा करके जीव को शब्द द्वारा मिला लेता है और उसका शब्द अटल है॥ १५॥
26यह प्राण एवं शरीर सब उसका ही दिया हुआ है और
27वह सच्चा साहिब ही मेरा मालिक है।
28हे नानक ! गुरु की वाणी द्वारा मैंने परमेश्वर को पा लिया है और उसका जाप कर उसमें ही लीन हूँ॥१६॥५॥१४॥
29मारू महला ३॥
30गुरुमुख का शब्द वेदों का ज्ञान एवं चिन्तन है,
31गुरुमुख को ही अपार ज्ञान एवं ध्यान की लब्धि होती है।
32जो वह कार्य करता है वही प्रभु को अच्छा लगता है और गुरुमुख ही पूर्ण परमेश्वर को पाता है॥ १॥
33गुरु-मुख संसार की वृतियों से मन को बदल देता है।
34गुरुमुख वाणी का नाद बजाता रहता है और
35सत्य में लीन रहकर वैरागी होकर सच्चे घर में वास प्राप्त कर लेता है॥ २॥
36गुरु की शिक्षा अमृत वाणी है और
37सच्चे शब्द द्वारा सत्य का ही उच्चारण किया है।
38सदा सत्य के रंग में लीन मेरा मन परम-सत्य में ही समा जाता है॥ ३॥
39गुरुमुख का निर्मल मन सत्य के सरोवर में स्नान करता है,
40उसे कोई मैल नहीं लगती और वह सत्य में ही समा जाता है।
41वह सदैव सत्य कर्म करता है और सच्ची भक्ति ही मन में बसाता है॥ ४॥
42गुरु-मुख सत्य ही बताता है और ऑखों से सत्य ही देखता है।
43वह सत्य का ही जीवन-आचरण अपनाता है।
44वह सदैव सत्य बोलता है और अन्यों को सत्य बोलने के लिए प्रेरित करता है॥ ५॥
45वह सच्ची एवं उत्तम वाणी पढ़ता, बोलता एवं गाता रहता है और
46परम सत्य का ही बखान करता है।
47वह सदैव परम-सत्य की अर्चना करता है और दूसरों को भी शब्द सुनाता रहता है॥ ६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं