गुरु ग्रंथ साहिब 1057 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1वह गुरु के शब्द द्वारा हरि-नाम का ही बखान करता है।
2वह दिन-रात हरि-नाम में लीन रहकर माया-मोह को मिटा देता है॥ ८॥
3गुरु की सेवा से मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है,
4वह अपने मन से अहंत्व, ममत्व और अपनेपन की भावना को दूर कर देता है।
5सुख देने वाला प्रभु स्वयं ही कृपा करता है और गुरु के शब्द से ही जीव शोभा का पात्र बनता है॥ ६॥
6गुरु का शब्द अमृतवाणी है।
7जो व्यक्ति नित्य परमात्मा का नाम जपता है,
8उसके हृदय में सच्चा परमेश्वर बस जाता है और उसका हृदय निर्मल हो जाता है॥ १०॥
9भक्त हरदम भगवान् की अर्चना में लीन रहते हैं,
10वे शब्द द्वारा उसका स्तुतिगान करते हैं और रंग में लीन होकर भगवान के गुण गाते हैं।
11वह स्वयं ही कृपा करके शब्द द्वारा मिला लेता है और उनके मन में चन्दन की सुगन्धि का वास हो जाता है।॥ ११॥
12जो व्यक्ति शब्द द्वारा अकथनीय कथा एवं स्तुति करता है
13मेरे सच्चे बेपरवाह प्रभु की ,
14वह गुणदाता स्वयं ही शब्द द्वारा उसे अपने साथ मिला लेता है और उसे ही शब्द का स्वाद मिलता है॥ १२॥
15मनमुखी जीव भटका हुआ है, अतः उसे कहीं भी सुख का ठिकाना नहीं मिलता।
16जो विधाता ने भाग्य में लिख दिया है, वह वही कर्म करता है।
17विषय-विकारों में लीन रहकर वह विषय-विकारों को ही खोजता है, फलस्वरूप जन्म-मरण का दुख भोगता है॥ १३॥
18हे प्रभु ! वास्तव में तू स्वयं ही अपनी प्रशंसा करता है,
19तेरे गुण तुझ में ही हैं।
20तू स्वयं ही सच्चा है, तेरी वाणी भी सच्ची है और तू स्वयं ही अलख और अथाह है॥ १४॥
21दाता गुरु के बिना कोई भी (भगवान् को) पा नहीं सकता,
22चाहे जीव लाखों करोड़ धर्म-कर्म भी करे।
23गुरु की कृपा से परमात्मा जिसके हृदय में बस गया है, वह शब्द द्वारा सत्य की ही स्तुति करता है॥ १५॥
24प्रभु को वही मनुष्य मिले हैं, जिन्हें उसने प्रारम्भ से लिखे हुक्म से स्वयं ही मिला लिया है।
25वे सच्ची वाणी एवं शब्द द्वारा सुन्दर बन गए हैं।
26दास नानक नित्य सत्यस्वरूप परमात्मा के गुण गाता है और गुणगान करके उस गुणनिधान में ही लीन हो जाता है॥ १६॥ ४॥ १३॥
27मारू महला ३॥
28केवल ईश्वर ही निश्चल है, वह सदैव शाश्वत है,
29इस बात की सूझ पूर्ण गुरु से ही प्राप्त होती है।
30जो व्यक्ति हरि-रस में भीगे हुए सदा ही उसका चिंतन करते रहते हैं, गुरु-मतानुसार शील आचरण ही उनका कवच बन जाता है॥ १॥
31जिसके मन में प्रभु का रंग है, वह सदा सत्यवादी है।
32गुरु के शब्द से उसे हरि का नाम ही प्यारा लगता है।
33नौ निधियाँ प्रदान करने वाला हरि-नाम उसके हृदय में बस गया है और उसने माया का लोभ मन से छोड़ दिया है॥ २॥
34दुर्मति के कारण राजा और प्रजा दुविधा में पड़े रहते हैं।
35सतिगुरु की सेवा किए बिना कोई भी प्रभु से एक रूप नहीं होता।
36जो एक ईश्वर का ध्यान करते हैं, वे सदैव सुख प्राप्त करते हैं और उनका ही शासन निश्चल रहता है॥ ३॥
37आवागमन से कोई नहीं बच सकता और
38इससे जन्म-मरण होता रहता है।
39गुरु के सान्निध्य में सदैव ईश्वर का ध्यान करो, इससे ही परमगति एवं मुक्ति मिलती है॥ ४॥
40सत्य एवं संयम सतिगुरु के द्वारा ही मिलते है और
41शब्द से ही अहम् एवं क्रोध का निवारण होता है।
42सतिगुरु की सेवा से सदैव सुख प्राप्त होता है और शील आचरण एवं संतोष इत्यादि शुभ गुण उत्पन्न हो जाते हैं।५॥
43अभिमान एवं मोह में संसार उत्पन्न होता है और
44प्रभु-नाम को भुला कर समूचा जगत् नाश हो जाता है।
45सतिगुरु की सेवा के बिना नाम प्राप्त नहीं होता और जगत् में नाम का ही सच्चा लाभ है॥ ६॥
46जिसे शब्द द्वार: परमात्मा का हुक्म सुन्दर लगता है,
47अनाहत ध्वनियों वाले पाँच शब्दों ने मिलकर उसके मन में बाजा बजाया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं