सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1056 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1विषय-विकारों के कारण वह लालच-लोभ का आचरण अपनाता है, जिससे दुर्मति के दोराहे पर पड़ा रहता है॥ ९॥

2पूर्ण सतिगुरु ही भक्ति दृढ़ करवाता है।

3जो गुरु के उपदेश से हरि-नाम में चित लगाता है,

4उसके ही मन-तन में प्रभु रमण करता है और प्रभु की भक्ति एवं स्तुतिगान से जीव का मन भीगता है॥ १०॥

5मेरा सच्चा प्रभु (विकार रूपी) असुरों का संहार करने वाला है।

6गुरु के शब्द द्वारा भक्ति करने से ही संसार-सागर से मुक्ति मिलती है।

7मेरा प्रभु सत्य है, सदैव ही परम सत्यहै और संसार के शाह-बादशाहों पर भी उसका ही हुक्म चलता है॥ ११॥

8हे भगवान् ! वही भक्तजन सच्चे हैं, जो तेरे मन को भा गए हैं,

9वे तेरे दर पर कीर्तिगान करते हैं और गुरु शब्द से ही सुन्दर लगते हैं।

10वे प्रतिदिन तेरी सच्ची वाणी गाते हैं और तेरा नाम ही उन निर्धनों की पूंजी है॥ १२॥

11जिन्हें तू स्वयं ही मिला लेता है, फिर खुद से जुदा नहीं करता।

12वे गुरु के उपदेश सदा तेरी प्रशंसा करते रहते हैं।

13समूचे विश्व में एक तू ही सबका मालिक है और वे शब्द-गुरु द्वारा तेरे नाम का ही स्तुतिगान करते हैं।॥ १३॥

14शब्द-गुरु के बेिना तुझे कोई भी जान नहीं सकता।

15तूने अपनी अकथनीय कथा स्वयं ही कही है।

16तू स्वयं ही शब्द है, सदा ही नाम देने वाला गुरु है और स्वयं ही हरि नाम जप कर वितरित करता है॥ १४॥

17तू स्वयं ही सृजनहार कर्ता है,

18तेरा लिखा कोई मिटाने वाला नहीं है।

19तू स्वयं ही गुरुमुख जीवों को नाम देता है और फिर उनके लिए कर्मालेख देने का भय नहीं रहता।॥ १५॥

20सच्चे भक्त तेरे दरबार पर

21श्रद्धा-प्रेम से शब्द की वंदना करते हैं।

22हे नानक ! वे वैरागी हुए तेरे नाम में लीन रहते हैं और नाम द्वारा उनका प्रत्येक कार्य सुन्दर हो जाता है॥ १६॥ ३॥ १२॥

23मारू महला ३॥

24मेरे सच्चे प्रभु ने एक अद्भुत खेल रचाया है और

25कोई भी जीव किसी दूसरे जैसा उत्पन्न नहीं किया।

26वह स्वयं ही जीवों के रंग, रूप, चेहरे में अन्तर डालकर उन्हें देखकर प्रसन्न होता है और सभी रस मानव-शरीर में ही हैं।॥ १॥

27हे परमात्मा ! तूने स्वयं ही शरीर में प्राणों का संचार किया है।

28शिव (जीव) शक्ति (माया) को शरीर में तूने ही डाला है।

29गुरु की कृपा से यदि जीव का मन माया की ओर से विरक्त हो जाए तो अमूल्य रत्न रूपी शब्द का ज्ञान प्राप्त हो जाता है॥ २॥

30अँधेरा एवं उजाला तूने स्वयं ही उत्पन्न किया है,

31उनमें एक तू ही व्याप्त है और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।

32गुरु की कृपा से जो मनुष्य अपने आपको पहचान लेता है, उसका हृदय-कमल खिल जाता है और उसे उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जाती है॥ ३॥

33अपनी गहरी गति सीमा को तू स्वयं ही जानता है।

34अन्य लोग सुन-सुनकर व्याख्या करते हैं।

35जो ज्ञानवान होता है, वह गुरुमुख बनकर इस रहस्य को बूझ लेता है और परमात्मा की सच्ची स्तुति करता रहता है॥ ४॥

36मानव-शरीर में ही बेअंत वस्तुएं हैं और

37ईश्वर स्वयं ही कपाट खोलने वाला है।

38गुरुमुख सहजावस्था में नामामृत का पान करता है और उसकी तृष्णाग्नि बुझ जाती है॥ ५॥

39परमात्मा ने सभी रस शरीर में ही डाले हैं और

40शब्द-गुरु द्वारा वह किसी विरले पुरुष को ही यह तथ्य समझाता है।

41जब मनुष्य अपने अन्तर्मन को खोजता है तो वह शब्द की ही स्तुति करता है, फिर वह बाहर क्यों जाएगा॥ ६॥

42नामामृत को चखे बिना किसी को भी उसका स्वाद नहीं आया।

43ईश्वर ने गुरु के शब्द द्वारा ही नामामृत का पान करवाया है।

44नामामृत का पान करके वे अमर हो गए हैं और गुरु के शब्द द्वारा ही उन्हें रस प्राप्त हुआ है॥ ७॥

45जो अपने आप को पहचान लेता है, वह सभी गुणों को जान लेता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं