सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1055 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1उसने शब्द-गुरु के भेद को चारों युग में पहचान लिया है।

2वह जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है और शब्द में ही लीन रहता है।॥ १०॥

3गुरुमुख नाम एवं शब्द की ही स्तुति करता है,

4जो अगम्य-मन वाणी से परे एवं बेपरवाह है।

5चारों युग एक हरि-नाम ही जीवों का उद्धार करने वाला है और शब्द द्वारा ही नाम का व्यापार होता है॥ ११॥

6गुरुमुख सदैव ही शान्ति एवं सुख प्राप्त करता है और

7अपने हृदय में हरि-नाम को बसा लेता है।

8जो गुरुमुख होता है, वह नाम के भेद को बूझ लेता है और उसकी दुर्मति का फन्दा कट जाता है॥ १२॥

9गुरुमुख सत्य से उत्पन्न होकर सत्य में ही विलीन हो जाता है।

10वह न ही जन्मता-मरता है और न ही योनि-चक्र में पड़ता है।

11गुरुमुख सदा ही परमात्मा के रंग में लीन रहता है और नित्य नाम का लाभ प्राप्त करता है॥ १३॥

12गुरुमुख भक्त प्रभु दरबार में सुन्दर लगते हैं और

13सच्ची वाणी शब्द द्वारा उनका जीवन-संवार देती है।

14वे दिन-रात परमात्मा के गुण गाते हैं और सहज ही अपने सच्चे घर पहुँच जाते हैं।॥ १४॥

15पूर्ण सतिगुरु शब्द सुनाता है,

16उपदेश करता है कि नित्य ध्यान लगाकर भगवान् की भक्ति करो।

17जो भगवान् का गुणगान करते हैं, वे सदैव ही निर्मल हैं और निर्मल गुणों के कारण बादशाह बन जाते हैं।॥ १५॥

18गुणों का दाता वह सत्यस्वरूप परमेश्वर ही है,

19इस रहस्य को कोई विरला गुरुमुख ही बूझता है।

20हे नानक ! परमात्मा का नाम बेपरवाह है, वह तो नाम का स्तुतिगान करके ही प्रसन्न रहता है। १६॥२॥ ११॥

21मारू महला ३॥

22अगम्य अपार ईश्वर की उपासना करो;

23उसका कोई अन्त एवं आर-पार पाया नहीं जा सकता।

24गुरु की कृपा से वह जिसके हृदय में बस जाता है, उस हृदय में अथाह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।॥ १॥

25सब जीवों में एक परमेश्वर ही व्याप्त है और

26गुरु की कृपा से वह प्रगट हो जाता है।

27जगत् को जीवन देने वाला परमात्मा सबका पोषण करता है और सब जीवों को रिजक देकर संभाल करता है॥ २॥

28पूर्ण सतिगुरु ने बूझकर यही समझाया है कि

29ईश्वर के हुक्म से समूचा जगत् उत्पन्न हुआ है।

30जो हुक्म मानता है, उसे ही सुख प्राप्त होता है और उसका हुक्म शाह-बादशाह सब पर चलता है॥ ३॥

31सच्चे सतगुरु का शब्द अपार है,

32उसके शब्द से संसार का उद्धार होता है।

33स्रष्टा स्वयं ही पैदा कर करके जीवों की देखभाल करता है और उन्हें श्वास एवं भोजन देता है॥ ४॥

34करोड़ों में से किसी विरले को ही वह ज्ञान प्रदान करता है,

35ऐसा पुरुष गुरु के शब्द द्वारा प्रभु के रंग में ही लीन रहता है।

36जिसे भक्ति एवं स्तुतिगान का वरदान प्रदान करता है, वह सदा सुख देने वाले ईश्वर का ही स्तुतिगान करता रहता है॥ ५॥

37वही मनुष्य सच्चे हैं, जो सतिगुरु की सेवा करते हैं।

38जो जन्मते-मरते रहते हैं, वे कच्चे ही हैं।

39ईश्वर अपहुँच, मन-वाणी से परे, बे-परवाह, भक्तवत्सल एवं गुणों का अथाह सागर है॥ ६॥

40पूर्ण सतगुरु ने जिसे सत्य-नाम दृढ़ करवा दिया है,

41वह सच्चे शब्द द्वारा सदैव ही प्रभु का गुणगान करता रहता है।

42गुणदाता परमेश्वर सबके अन्तर्मन में व्याप्त है और वह सबके माथे पर भाग्य एवं मृत्यु का समय लिखता है॥ ७॥

43गुरुमुख जीव को वह सदैव ही आस-पास अनुभव होता है।

44जो ब्रह्म-शब्द की उपासना करता है, वह सदा तृप्त रहता है।

45जो मनुष्य नित्य सच्ची वाणी द्वारा परमात्मा की सेवा करता है, सच्चे शब्द द्वारा उसके मन में भक्ति के लिए उत्साह बना रहता है।॥ ८॥

46अन्धा अज्ञानी आदमी अनेक कर्म करता है और

47मन के हठ से कर्म करके पुनः योनियों में ही पड़ता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं