गुरु ग्रंथ साहिब 1054 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1पूर्ण सतिगुरु ने यही सूझ प्रदान की है कि
2एक परमात्मा का नाम मन में बसाओ,
3नाम जपो, नाम का ध्यान करो और गुणगान करके मंजिल पा लो॥ ११॥
4प्रभु का अपार हुक्म मानकर सेवक उसकी ही सेवा करते हैं।
5लेकिन मनमुख जीव हुक्म के महत्व को नहीं जानते।
6जो उसके हुक्म को मानता है, वह हुक्म से ही बड़ाई प्राप्त करता है और उसके हुक्म से बेपरवाह हो जाता है॥ १२॥
7गुरु की कृपा से जो हुक्म को पहचान लेता है,
8वह भटकते मन को टिकाकर एकाग्रचित कर लेता है।
9नाम में लीन रहने वाला वैराग्यवान बना रहता है और नाम रत्न उसके मन में स्थित हो जाता है॥ १३॥
10समूचे जगत् में एक ईश्वर ही व्याप्त है और
11गुरु की कृपा से ही वह प्रगट होता है।
12जो ब्रह्म-शब्द की प्रशंसा करते हैं, वही भक्तजन निर्मल हैं और उनका आत्म-स्वरूप में निवास हो जाता है।॥१४॥
13हे परमेश्वर ! भक्त सदैव तेरी शरण में रहते हैं,
14तू अगम्य, मन-वाणी से परे है, तेरा मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
15जैसे तू चाहता है, वैसे ही जीवों को रखता है और गुरु के माध्यम से तेरे नाम का ध्यान होता है॥ १५॥
16हे सच्चे मालिक ! मैं सदा तेरा गुणगान करता रहूँ ताकि
17तेरे मन को भा जाऊँ।
18नानक सच्ची विनती करता है कि मुझे सत्य-नाम प्रदान करो, ताकि मैं सत्य में विलीन हो जाऊँ॥ १६॥ १॥ १०॥
19मारू महला ३॥
20जो सतगुरु की सेवा करते हैं, वही खुशकिस्मत हैं और
21रात-दिन उनकी सच्चे-नाम में लगन लगी रहती है।
22सुख देने वाला परमात्मा सदैव उनके हृदय में रमण करता है और उनके मन में सच्चे शब्द की उमंग बनी रहती है॥ १॥
23यदि कृपा करे तो वह जीव को गुरु से मिला देता है और
24गुरु परमात्मा का नाम मन में बसा देता है।
25जब सदा सुख देने वाला परमेश्वर मन में बस जाता है तो ही शब्द द्वारा उसके मन में भक्ति के लिए उत्साह उत्पन्न होता है।॥ २॥
26अगर कृपा-दृष्टि कर दे तो गुरु से मिलाकर स्वयं में मिला लेता है।
27जीव शब्द-गुरु द्वारा अहम् एवं ममता को जला देता है।
28एक प्रभु के प्रेम में लीन वह सदैव मोह-माया से मुक्त रहता है और उसका किसी से कोई वैर-विरोध नहीं रहता॥ ३॥
29सतगुरु की सेवा के बिना अज्ञानता का घोर अंधेरा बना रहता है और
30शब्द के बिना कोई संसार-सागर में से पार नहीं हो सकता।
31जो शब्द में लीन रहते हैं वही महा वैरागी हैं और शब्द द्वारा लाभ पाते हैं।॥ ४॥
32दुख-सुख तो परमात्मा ने जन्म से पूर्व ही भाग्य में लिखा हुआ है और
33उसने ही द्वैतभाव का प्रसार किया है।
34जो गुरुमुख बन जाता है, वह मोह-माया से निर्लिप्त रहता है, किन्तु मनमुखी जीव का अल्पमात्र भी विश्वास नहीं किया जा सकता॥ ५॥
35मनमुख वही हैं जो शब्द के भेद को नहीं पहचानते और
36गुरु के भय का महत्व नहीं जानते।
37भय के बिना निर्भय सत्य कैसे पाया जा सकता है ? यम मनमुख की जीवन-साँसे ही निकाल लेगा।॥ ६॥
38भयंकर यम को मारा नहीं जा सकता किन्तु
39गुरु के शब्द से वह जीव के निकट नहीं आता।
40जब शब्द सुनता है तो दूर से ही भाग जाता है कि शायद बेपरवाह परमेश्वर मुझे समाप्त न कर दे॥ ७॥
41समूचे विश्व में परमात्मा का ही शासन है, उसका हुक्म सब पर चलता है,
42फिर यह यम बेचारा क्या कर सकता है ?
43यह तो उसका हुक्म मानने वाला सेवक है, हुक्म का पालन करता है और हुक्म से ही जीव की जीवन-सॉसें निकलता है॥ ८॥
44गुरुमुख को ज्ञान है कि सच्चे परमेश्वर ने ही सृष्टि-रचना की है और
45समूचा जगत्-प्रसार उसका ही है।
46जो गुरुमुख होता है, वह सत्य को बूझ लेता है और सच्चे शब्द द्वारा ही उसे सुख उपलब्ध होता है।॥ ९॥
47गुरुमुख समझ लेता है कि विधाता कर्मो के अनुसार ही फल प्रदान करता है और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं