गुरु ग्रंथ साहिब 1053 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1वह स्वयं ही क्षमा करके सत्य दृढ़ करवाता है और जीव का मन-तन सत्य में लीन हो जाता है।॥११॥
2यह मन तन विकारों के कारण मैला है, परन्तु उस में अपार प्रभु की ही ज्योति स्थित है।
3गुरु-मतानुसार विचार करके ही जीव इस भेद को समझ पाता है।
4अहम् को मारकर मन सदैव निर्मल रहता है और वह अपनी रसना से सुखदाता परमेश्वर की ही अर्चना करता है॥ १२॥
5शरीर रूपी किले में अनेक दुकानें बाजार हैं,
6जिसमें अपार प्रभु नाम का व्यापार होता है।
7गुरु के शब्द द्वारा जिसने अहम् को मिटाकर प्रभु को पहचान लिया है, वह सदैव उसके द्वार पर शोभा प्राप्त करता है।॥१३॥
8अगम्य अपार हरि का नाम अमूल्य रत्न है,
9जीव बेचारा उसकी क्या उपमा कर सकता है।
10जिसने अपने मन में शब्द को पहचान लिया है, वह गुरु के शब्द द्वारा ही तोल सकता है॥ १४॥
11स्मृतियों एवं शास्त्रों में विस्तारपूर्वक व्याख्या है, जो माया-मोह का फैला हुआ प्रसार ही है।
12मूर्ख लोग इनका पाठ-पठन करते हैं किन्तु शब्द के भेद को नहीं समझते। किसी विरले गुरुमुख ने ही शब्द के भेद को पहचाना है॥ १५॥
13ईश्वर स्वयं ही करने-करवाने वाला है,
14वह सच्ची वाणी द्वारा सत्य ही दृढ़ करवाता है।
15हे नानक ! उस मनुष्य को नाम से ही बड़ाई मिलती है, जिसने युग-युगांतर एक प्रभु को व्याप्त मान लिया है॥ १६॥ ६॥
16मारू महला ३॥
17एक वही सृजनहार है, सो उस परम-सत्य की ही उपासना करो।
18वह शब्द द्वारा दुखों का निवारण करने वाला है।
19वह अपहुँच, ज्ञानेन्द्रियों की समझ से परे है और किसी ने भी उसकी सही कीमत नहीं आँकी, वह स्वयं ही अगम्य एवं अथाह है।॥ १॥
20वह सच्चा प्रभु स्वयं ही सत्य का विस्तार करता है।
21कुछ जीवों को वह स्वयं ही सत्य में लवलीन कर देता है।
22वे सत्य की अर्चना करते हैं, सच्चा आचरण अपनाते हैं और सत्य-नाम में ही समाहित हो जाते हैं।॥ २॥
23प्रभु स्वयं ही भक्तों को अपने साथ मिला लेता है और
24स्वयं ही उन्हें अपनी सच्ची भक्ति में लगाता है।
25वे सच्ची वाणी द्वारा सदैव परमात्मा के गुण गाते हैं और इस मानव-जन्म का भी यही लाभ है॥ ३॥
26गुरुमुख नाम का व्यापार करते हैं और पराए-अपने की पहचान करते हैं।
27वे एक ईश्वर के बिना अन्य किसी को नहीं जानते।
28परमात्मा सच्चा साहूकार है, उसके भक्त सच्चे व्यापारी हैं और नाम रूपी पूंजी ही खरीदते हैं।॥४॥
29वह स्वयं ही रचना करके सृष्टि उत्पन्न करता है और
30किसी विरले को शब्द-गुरु द्वारा यह रहस्य बताता है।
31सतगुरु की सेवा करने वाले व्यक्ति ही सत्यशील हैं और उनका यम का फन्दा काट देता है॥ ५॥
32ईश्वर स्वयं ही तोड़ता, बनाता, संवारता एवं रचना करता है।
33उसने जीवों को माया-मोह एवं द्वैतभाव के स्वार्थ में लगाया हुआ है।
34मनमुख सदा ज्ञानहीन कर्म करते हुए भटकते रहते हैं और मौत का फन्दा उनके गले में पड़ता है॥ ६॥
35दयालु प्रभु स्वयं ही क्षमा करके गुरु की सेवा में लगा देता है और
36गुरु-मतानुसार नाम मन में बसा देता है।
37फिर मनुष्य दिन-रात हरि-नाम का ध्यान करते हैं और इस जगत् में नाम का ही लाभ है॥ ७॥
38ईश्वर सत्य है, उसका नाम भी सत्य है।
39वह गुरु के माध्यम से ही जीव को नाम देता है और नाम मन में बसा देता है।
40जिनके मन में नाम अवस्थित हो गया है, उनके सिर से पापों का भार उतर गया है और वे प्रभु-दरबार में सुन्दर लगते हैं।॥ ८॥
41अगम्य, अगोचर परमेश्वर का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता और
42गुरु की कृपा से ही मन में बसता है।
43जो शब्द द्वारा सदैव गुणदाता प्रभु का स्तुतिगान करता है, उससे कर्मो का हिसाब-किताब कोई नहीं माँगता॥ ९॥
44ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर उसकी उपासना करते हैं लेकिन
45वे अदृष्ट-अभेद परमात्मा का अन्त प्राप्त नहीं करते।
46हे परमेश्वर ! जिन पर तू अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उन्हें गुरु के माध्यम से अपने अदृष्ट रूप के दर्शन करवा देता है॥ १०॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं