गुरु ग्रंथ साहिब 1051 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1गुरुमुख ने शब्द द्वारा स्वयंभू परमेश्वर को ही पहचाना है,
2जिसका न कोई परिवार है, न कोई माता है,
3केवल एक वही सबके अन्तर्मन में रमण कर रहा है और वह सब जीवों का आधार है॥ १३॥
4मनुष्य को अहंत्व, ममता एवं द्वैतभाव ही अच्छा लगता है।
5मालिक ने प्रारम्भ से लिख दिया है कि अन्तिम समय कुछ भी साथ नहीं जाता।
6जो सच्चे गुरु से दीक्षा लेकर सच्चा आचरण अपनाता है, परमात्मा उसके सब दुख दूर कर देता है।॥ १४॥
7हे ईश्वर ! जिसे तू देता है, वह सदैव सुख प्राप्त करता है और
8वह सच्चे शब्द द्वारा सच्चा आचरण अपनाता है।
9उसके अन्तर्मन में सत्य बसा रहता है, उसका तन-मन सच्चा हो जाता है और वह भक्ति के भंडार भर लेता है॥ १५॥
10वह स्वयं ही देखता है, सब पर अपना हुक्म चलाता है और
11अपनी इच्छानुसार ही जीवों से करवाता है।
12हे नानक ! वैराग्यवान जीव नाम में ही लीन रहते हैं और प्रभु के नाम ने उनका मन, तन एवं जीभ संवार दी है॥ १६॥ ७॥
13मारू महला ३॥
14वह स्वत: प्रकाश स्वयंभू है और
15एक वही प्रच्छन्न रूप में सब में व्याप्त है।
16जिसने अपने आप को पहचान लिया है, उसे यह ज्ञान हो गया है कि जगत् को जीवन देने वाला सब की देखभाल करता है॥ १॥
17जिसने ब्रह्म, विष्णु एवं शिव को उत्पन्न किया है,
18उस परमात्मा ने पैदा करके स्वयं ही अपने-अपने कार्य में लगा दिया है।
19जिसे वह पसंद करता है, उसे स्वयं ही मिला लेता है, जिसने गुरु के सान्निध्य में एक ईश्वर के भेद को समझ लिया है॥ २॥
20यह संसार जन्म-मरण के चक्र में पड़ा हुआ है,
21मोह-माया के कारण मनुष्य बहुत विकारों को सोचता रहता है।
22जिसने गुरु का शब्द पहचान लिया है, वह सदैव ही अविनाशी प्रभु का स्तुतिगान करता रहता है॥ ३॥
23कई ईश्वर में लीन है और उन्होंने सच्चा सुख पा लिया है।
24जो इष्ट देवी-देवताओं की पूजा में लीन हो गए, उन्होंने अपना जीवन व्यर्थ गवां लिया।
25उन लोगों को अमृत फल प्राप्त होता है, जो मीठे वचन बोलते हैं।॥ ४॥
26हे परमपिता ! हम जीवों में कोई गुण नहीं है, फिर हम क्या बात करें ?
27तू सब को देखता है और उनके कर्मों को तौलता रहता है।
28जैसा तुझे मंजूर है, वैसे ही तू रखता है, वैसे ही हमने रहना है और गुरु के सान्निध्य में तुझे जाना है॥ ५॥
29जब तुझे स्वीकार हो तो तू सच्चे कार्य में लगा देता है।
30फिर जीव अवगुणो छोड़कर गुणों में लीन हो जाता है।
31केवल एक निर्मल प्रभु ही गुणों में बसता है, जिसे गुरु के शब्द द्वारा ही पहचाना जा सकता है।॥ ६॥
32जहाँ भी देखता हूँ, वहाँ एक वही मौजूद है।
33शब्द द्वारा द्वैतभाव दुर्मति दूर कर दी है।
34वह एक प्रभु एक स्वयं में ही लीन रहता है और सदैव ही अपने रंग में रंगा रहता है॥ ७॥
35यह शरीर कमल की तरह शीघ्र ही मुरझाने वाला है किन्तु
36अनजान मनमुख शब्द के भेद को नहीं समझता।
37जो गुरु की कृपा से अपने शरीर को खोजता है, वह जगजीवन दाता को पा लेता है।८॥
38वह शरीर रूपी किले में से पापों का निवारण कर देता है
39जो सदैव ही परमात्मा को हृदय में बसाकर रखता है।
40वह मनवांछित फल प्राप्त करता है और उसका मन मजीठ के रंग की तरह प्रभु-प्रेम में रंग जाता है॥ ९॥
41मनमुख जीव ज्ञान की बातें तो करता है किन्तु उसे खुद कोई ज्ञान नहीं होता।
42इसलिए वह बार-बार जन्म लेता रहता है और उसे सुख का कोई ठिकाना नहीं मिलता।
43गुरुमुख को ज्ञान होता है, वह सदा परमात्मा की प्रशंसा करता है और युग-युगांतर उस एक को ही अटल मानता है॥ १०॥
44मनमुख जितने भी कर्म करता , उससे सब दुख ही पैदा होते हैं।
45उसके मन में शब्द ही नहीं, तो वह प्रभु के द्वार पर कैसे जा सकता है।
46गुरुमुख के मन में शब्द अवस्थित है और वह सदा सुखदाता की उपासना करता है॥ ११॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं