गुरु ग्रंथ साहिब 1050 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji
1गुरु का ज्ञान एकमात्र परमेश्वर को ही जानता है और वह रात-दिन नाम में ही लीन रहता है॥ १३॥
2जीव वेदों का पाठ करता है परन्तु हरि-नाम के रहस्य को नहीं बूझता।
3पाठ-पठन कर वह माया के कारण उलझता रहता है।
4मन में मैल होने के कारण अज्ञानी एवं अंधा क्योंकर दुस्तर संसार-सागर से पार हो सकता है॥१४॥
5पण्डित लोग वेदों के वाद-विवाद कहकर उसकी व्याख्या करते हैं,
6परन्तु इससे न ही उनका मन भीगता है और न ही उन्हें शब्द की पहचान होती है।
7समस्त वेदों ने यही दृढ़ करवाया है कि पाप-पुण्य क्या है परन्तु गुरुमुख नामामृत का ही पान करता है॥ १५॥
8एक ईश्वर ही सत्य है,
9उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
10हे नानक ! जो मनुष्य नाम में लीन हो गए हैं, उनका ही मन सच्चा है और वे एक सत्य का ही चिंतन करते हैं॥ १६॥ ६॥
11मारू महला ३॥
12सच्चे परमेश्वर ने (सृष्टि को) अपना सच्चा सिंहासन बनाया है,
13वह अपने निजघर (दसम द्वार) में बस गया है और वहाँ मोह-माया का कोई प्रभाव नहीं।
14जिसके हृदय में सदैव सत्य बसा रहता है, उस गुरुमुख का आचरण भी श्रेष्ठ है॥ १॥
15जब (नाम रूपी) सच्चा सौदा और सच्चा व्यापार किया जाता है,
16तब वहाँ कोई भृम एवं द्वैतभाव का प्रसार नहीं होता।
17सच्चे धन का लाभ प्राप्त करने से कोई कमी नहीं आती, कोई विरला विचारवान ही इस तथ्य को बूझता है॥ २॥
18सच्चे प्रभु ने जिन्हें इस व्यापार में लगाया है, वही इस में लग गए हैं।
19जिनके मस्तक पर उत्तम भाग्य होता है, उनके मन में शब्द का निवास होता है।
20सच्चे शब्द द्वारा वे परमात्मा का ही गुणगान करते हैं और ऐसे विवेकशील पुरुष शब्द में लीन रहते हैं।॥ ३॥
21मैं परम-सत्य परमेश्वर की ही स्तुति करता हूँ, जो सदैव शाश्वत है।
22उस एक को ही देखता हूँ और उसके बिना दूसरा कोई नहीं।
23गुरु का उपदेश ही सर्वश्रेष्ठ सीढ़ी है, जिससे सत्य तक पहुँचा जा सकता है और ज्ञान रत्न से अहम् को मिटाया जा सकता है॥ ४॥
24ब्रह्म-शब्द ने मोह-माया को जलाया है।
25हे ईश्वर ! जब तुझे भाया तो मन में सत्य अवस्थित हो गया।
26सच्चे प्रभु का किया हुआ सब कुछ सत्य है और नेक आचरण अपनाने से अहंकार एवं तृष्णा को दूर किया जा सकता है॥ ५॥
27माया-मोह सब परमात्मा ने ही बनाया है और
28किसी विरले गुरुमुख ने इस तथ्य की पहचान की है।
29जो गुरुमुख बन जाता है, वह नेक आचरण अपनाता है और सच्ची करनी ही उसका श्रेष्ठ कर्म है॥६॥
30उसने वही कार्य किया है, जो मेरे प्रभु को भाया है और
31शब्द द्वारा अहम् एवं तृष्णाग्नि बुझा ली है।
32गुरु की शिक्षा द्वारा मन सदैव शीतल रहता है और अभिमान को मारकर मन से दूर कर दिया है॥ ७॥
33जो सत्य में लीन हो गए हैं, उन्हें सब कुछ अच्छा लगता है।
34वे सच्चे शब्द में ही मग्न रहते हैं और सत्य से ही शोभा प्राप्त करते हैं।
35जो इहलोक में सत्यशील होते हैं, वे प्रभु के दरबार में भी सत्यशील माने जाते हैं और कृपानिधान प्रभु ने अपनी कृपादृष्टि से उन्हें संवार दिया है॥ ८॥
36सत्य के बिना जो द्वैतभाव में चित लगाता है,
37उसे माया-मोह के दुख लगे रहते हैं।
38गुरु के बिना उसे यह मालूम नहीं होता कि दुख सुख क्या है? मोह-माया का दुख बहुत भारी है॥ ९॥
39जिनके मन को सच्चा शब्द भा गया है,
40उन्होंने पूर्व कर्मालेख का फल पा लिया है।
41वे विवेकशील पुरुष सत्य की उपासना करते हैं, सत्य का मनन करते हैं और सत्य में ही लीन रहते हैं।॥ १०॥
42उन्हें गुरु की सेवा ही मीठी लगी है और
43रात दिन सहज-समाधि लगाकर सुखी रहते हैं।
44परमात्मा का नाम जपते हुए उनका मन निर्मल हुआ है और उन्हें गुरु की सेवा ही प्यारी लगी है॥ ११॥
45वही भक्तजन सुखी हैं, जिन्हे सतगुरु ने प्रभु की भक्ति में लगा दिया है।
46परमात्मा ने अपनी मर्जी से स्वयं ही मिला लिया है।
47जिनकी सतगुरु ने रक्षा की है, वे उबर गए हैं लेकिन अन्य माया-मोह में ही ख्वार हुए हैं। १२॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं