सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 104 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji

1गुरु के दर्शन करने से समस्त मनोरथ व दिल की इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।॥ २॥

2अगम्य व अगोचर प्रभु का अंत जाना नहीं जा सकता।

3ज्ञांनी, सिद्ध, साधक उस भगवान का ही ध्यान करते हैं।

4जिस व्यक्ति का अहंकार मिट जाता है और भ्रम दूर हो जाता है, गुरु उसके हृदय में ही भगवान को प्रगट कर देते हैं।॥ ३॥

5भगवान के नाम का जाप करने से आनंद एवं खुशियाँ प्राप्त हो जाती हैं और यह मुक्तिदायक एवं गुणों का भण्डार है। जो व्यक्ति भगवान के नाम का सिमरन करता है, उसे सुख एवं आनंद उपलब्ध हो जाते हैं।

6हे नानक ! जिस व्यक्ति पर मेरा स्वामी कृपालु हो जाता है, उसके हृदय-घर में ही भगवान का नाम आ बसता है॥ ४ ॥ २५ ॥ ३२ ॥

7माझ महला ५ ॥

8हे प्रभु ! अपने कानों से तेरी शोभा सुन-सुनकर ही जीता हूँ।

9हे मेरे महान ठाकुर ! तुम मेरे प्रियतम हो।

10हे गोपाल ! अपने कर्म तू ही जानता है। मुझे तेरा ही आश्रय है॥ १॥

11तेरी महिमा-स्तुति गाने से मन प्रफुल्लित हो जाता है।

12तेरी कथा सुनने से मन के विकारों की तमाम मलिनता दूर हो जाती है।

13साधुओं एवं संतों की संगति में मिलकर मैं सदैव दया के घर परमात्मा का चिन्तन करता हूँ॥ २॥

14अपने प्रभु को मैं श्वास-श्वास से स्मरण करता हूँ।

15यह मति गुरु की कृपा से अपने मन में धारण करो।

16हे भगवान ! तेरी कृपा से ही मेरे मन में तेरी ज्योति का प्रकाश हुआ है। तू समस्त जीव-जन्तुओं तथा सबका रक्षक है॥ ३॥

17प्रभु आदि भी सत्य है जुगों जुगों में सत्य रहा है, वर्तमान में भी सत्य है

18और वह प्रभु सदैव ही सत्य रहेगा ।

19हे प्रिय प्रभु ! तेरी अदभुत लीलाएँ जगत् में प्रत्यक्ष हैं। हे नानक ! मैं प्रभु की उन अदभुत लीलाओं को देखकर कृतार्थ हो गया हूँ॥ ४॥ २६॥ ३३॥

20माझ महला ५ ॥

21भगवान के हुक्म से मेघ बरसने लगे हैं।

22सज्जन संत मिलकर भगवान के नाम का जाप करते हैं।

23संतों के ह्रदय शीतल एवं शांत हो गए हैं और उन्हें सहज सुख उपलब्ध हो गया है। भगवान ने स्वयं ही संतों के हृदय में शांति प्रदान की है॥ १॥

24भगवान ने सब कुछ अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न किया है।

25अपनी कृपा से परमात्मा ने सभी को सन्तुष्ट कर दिया है।

26हे मेरे दाता ! अपनी देन प्रदान करो ताकि सभी जीव-जन्तु तृप्त हो जाएँ॥ २॥

27मेरा मालिक प्रभु सदैव सत्य है और उसकी महिमा भी सत्य है।

28गुरु की कृपा से मैं सदैव ही उसका ध्यान करता रहता हूँ।

29उस प्रभु ने मेरा जन्म-मरण का भय एवं माया का मोह नाश कर दिया है॥३ ॥

30नानक तो श्वास-श्वास से भगवान की महिमा-स्तुति ही करता है।

31भगवान का सिमरन करने से उसकी तमाम जंजीरें कट गई हैं।

32भगवान ने एक क्षण में उसकी आशा पूरी कर दी है, अब तो वह भगवान के नाम का ही जाप करता रहता है और उसकी ही महिमा गाता रहता है॥ ४ ॥ २७ ॥ ३४ ॥

33माझ महला ५ ॥

34हे मेरे संतजनों एवं प्रिय मित्रों ! आओ

35हम मिलकर अगम्य व अनन्त प्रभु का यशोगान करें।

36भगवान की महिमा गाने एवं सुनने वाले सभी व्यक्ति माया के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। आओ हम उस प्रभु की आराधना करें जिसने हमें उत्पन्न किया है। १॥

37भगवान का सिमरन करने से जन्म-जन्मांतरों के तमाम पाप नष्ट हो जाते हैं

38और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

39उस सत्य प्रभु-परमेश्वर की आराधना करो, जो सभी को भोजन पदार्थ देता है॥ २॥

40भगवान के नाम का जाप करने से सर्व सुख मिल जाते हैं।

41हरि-प्रभु की आराधना करने से तमाम भय नाश हो जाते हैं।

42जो परमात्मा की सेवा करता है, वह पूर्ण पुरुष है और उसके समस्त कार्य संवर जाते हैं।॥ ३॥

43हे प्रभु ! मैं तेरी शरण में आ गया हूँ,

44जैसे तुझे अच्छा लगता है वैसे ही मुझे अपने साथ मिला लो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं