सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1049 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1मोह-माया में मस्त जीव को कोई होश नहीं होती।

2अन्धे मनमुख को कोई ज्ञान नहीं होता, परन्तु गुरु के उपदेश से ही ह्रदय में नाम का आलोक होता है॥ १४॥

3मनमुखी जीव अहंकार एवं मोह-माया में ही सोए रहते हैं।

4वे कामादिक दूतों से अपने हृदय-घर की संभाल नहीं करते और अंत में ख्वार होते हैं।

5वे पराई निन्दा करते हैं, चिन्ता उन्हें बहुत जलाती है और सदैव दुखी रहते हैं।॥ १५॥

6ईश्वर स्वयं ही मनमुखों से ऐसा कार्य करवाता है परन्तु

7वह गुरुमुखों को ज्ञान प्रदान कर देता है।

8हे नानक ! नाम में लीन होने से मन निर्मल हो जाता है और जीव नाम द्वारा नाम-स्मरण में ही लीन रहता है॥ १६॥ ५॥

9मारू महला ३॥

10एक ईश्वर की ही उपासना करता हूँ जो सदैव स्थिर एवं शाश्वत है।

11द्वैतभाव में लीन समूचा जगत् नाशवान है।

12गुरु उपदेशानुसार सदा ही सत्य की स्तुति करता हूँ और मन उस परम-सत्य से ही संतुष्ट होता है।॥ १॥

13हे गुणों के सागर ! तेरे गुण बेअंत हैं, किन्तु मैंने तेरे एक गुण को भी नहीं जाना।

14हे जग-जीवन दाता ! तू स्वयं ही अपनी भक्ति में लगा लेता है,

15स्वयं ही क्षमा करके बड़ाई प्रदान करता है और गुरु-मत से ही यह मन हरि-रस में भीगता है॥ २॥

16शब्द द्वारा माया की लहर को दूर कर दिया है और

17अभिमान को मिटाकर यह मन निर्मल हो गया है।

18राम के रंग में लीन रसना स्वाभाविक ही गुणगान करती है॥ ३॥

19मैं-मेरी करते हुए सारी आयु व्यतीत हो जाती है,

20मनमुखी जीव को ज्ञान नहीं होता और वह अज्ञानता में भटकता रहता है।

21यम उसे हर घड़ी - देखता रहता है और प्रतिदिन उसकी आयु कम होती है॥ ४॥

22वह मन में लोभ करता है पर इसके फल को नहीं बूझता।

23यम उसके सिर पर खड़ा है किन्तु उसे कोई सूझ नहीं।

24जो कर्म किया है, वही आगे (परलोक में) आया है, अब वह अंतकाल क्या कर सकता है॥ ५॥

25जो सत्य में लवलीन हो जाते हैं,उनकी ही सच्ची शोभा होती है।

26द्वैतभाव में लीन मनमुखी जीव रोते हैं।

27ईश्वर स्वयं लोक-परलोक का मालिक है और स्वयं ही गुणों पर प्रसन्न होता है॥ ६॥

28गुरु के शब्द द्वारा मनुष्य सदैव शोभा का पात्र बनता है।

29नाम रूपी रसायन का पान करके यह मन मोहित हो जाता है।

30फिर मोह-माया की मैल बिल्कुल नहीं लगती और मन गुरु-मतानुसार हरि नाम में भीग जाता है॥ ७॥

31सब जीवों में एक ईश्वर ही व्याप्त है और

32गुरु की कृपा से वह प्रगट हो जाता है।

33अभिमान को मिटाकर सदैव सुख प्राप्त होता है और सत्य-नाम में लीन रहकर नामामृत का पान होता है॥ ८॥

34पाप-दुखों का निवारण करने वाला ईश्वर ही है और

35गुरुमुख ने शब्द-चिंतन द्वारा उसकी ही उपासना की है।

36वह स्वयं ही सब कुछ कर रहा है और नाम-स्मरण से गुरुमुख का तन-मन भीग जाता है॥ ९॥

37माया की अग्नि समूचे संसार में जल रही है,

38लेकिन गुरु शब्द के चिंतन द्वारा इसका निवारण कर देता है।

39जिसने गुरु की शिक्षा द्वारा नाम-स्मरण किया है, उसके मन को ही शान्ति मिली है और सदैव सुख पा लिया है॥ १०॥

40अपने सिंहासन पर विराजमान स्वर्गाधिपति देवराज इन्द्र भी यम का भय अनुभव करता है।

41अगर कोई अनेक धर्म-कर्म करता है, परन्तु यम उसे भी नहीं छोड़ता।

42जीव को मुक्ति तभी मिलती है, जब उसकी सतगुरु से भेंट होती है और जिव्हा हरिनामामृत का पान करती है॥ ११॥

43मनमुखी जीव के मन में प्रभु-भक्ति उत्पन्न नहीं होती मगर

44गुरुमुख को भक्ति से शान्ति एवं सुख उत्पन्न हो जाता है।

45वाणी सदैव पवित्र एवं पावन है और गुरु उपदेशानुसार हृदय भीग जाता है॥ १२॥

46ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश भी माया के तीन गुणों में बँधे हुए हैं और

47मुक्ति उनसे निराली रहती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं