सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1047 · Raag Maaroo · Guru Amar Daas Ji

1जो परमात्मा को मंजूर है, वह वही करेगा।

2अपने आप न कुछ हुआ है और न ही कुछ (भविष्य में) होगा।

3हे नानक ! प्रभु-नाम के मनन से ही बड़ाई मिलती है और सच्चे द्वार पर सम्मान प्राप्त होता है॥ १६॥ ३॥

4मारू महला ३॥

5जो भी आया है, आखिरकार सब ने संसार से जाना है,

6(मृत्यु अटल है) द्वैतभाव के कारण जीव यम की फाँसी में बंधा रहता है।

7जिनकी सतिगुरु ने रक्षा की है, उनका उद्धार हो गया है और वे परम-सत्य में ही विलीन हो गए हैं।॥ १॥

8परमात्मा स्वयं ही जीवों को पैदा कर करके उनकी संभाल करता है।

9जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वही मनुष्य परवान होता है।

10गुरुमुख को ज्ञान द्वारा सब कुछ सूझ हो जाती है परन्तु अज्ञानी जीव अंधा आचरण ही करता है॥ २॥

11मनमुख के मन में संशय बना रहता है और उसे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता,

12इसलिए मर-मर कर जन्मता और अपना जीवन व्यर्थ गॅवा देता है।

13गुरुमुख प्रभु-नाम में लीन रहकर सुख प्राप्त करता है और सहज ही सत्य में समाहित हो जाता है।॥ ३॥

14मन जगत् के धंधो में भाग-दौड़ करता हुआ लोहा बन जाता है,

15लेकिन यदि पूर्ण गुरु से भेंट हो जाए तो पुनः कंचन हो जाता है।

16जब परमात्मा स्वयं ही जीव को क्षमा कर देता है तो ही वह सुख प्राप्त करता है और वह शब्द द्वारा मिला लेता है॥ ४॥

17खोटी बुद्धि वाली जीव-स्त्री झूठी एवं बुरी है और बुराई में ही लीन रहती है।

18वह गुणविहीन अवगुणों में जीवन व्यतीत करती है।

19उसकी बुद्धि कच्ची है, वह अपने मुँह से फीका ही बोलती है अतः खोटी बुद्धि वाली जीव-स्त्री को नाम प्राप्त नहीं होता॥ ५॥

20गुणहीन जीव-स्त्री पति-प्रभु को अच्छी नहीं लगती,

21वह मन की अपवित्र, अपवित्र कर्म ही करती है।

22ऐसी मुर्ख जीव-स्त्री पति-प्रभु के संयोग के आनंद को नहीं जानती और गुरु के बिना उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता।॥ ६॥

23खोटी बुद्धि वाली जीव-स्त्री खोटी है और छल-कपट का आचरण ही अपनाती है,

24वह झूठा श्रृंगार करती है, इसलिए पति-प्रभु को अच्छी नहीं लगती।

25लेकिन गुणवान जीव-स्त्री सदैव अपने पति-प्रभु के संग रमण करती है और सतिगुरु ने ही उसे प्रभु से मिलाया है॥ ७॥

26परमात्मा स्वयं ही हुक्म करता है और सब को देखता है।

27किसी को वह कर्म लेख अनुसार क्षमा कर देता है।

28जो सदैव हरि-नाम में लीन रहते हैं, उन्होंने सत्य को पा लिया है और स्वयं ही साथ मिला लिया है॥ ८॥

29माया जीवों को अहम् एवं मोह के स्वाद में लगा देती है।

30मगर गुरुमुख ईश्वर में ध्यान लगाकर सहजावस्था में ही समाया रहता है।

31परमात्मा स्वयं ही जीवों को मिलाता, स्वयं ही पैदा करके उनकी देखभाल करता है, परन्तु सतिगुरु के बिना किसी को भी इस रहस्यं का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है॥ ९॥

32कोई ब्रह्म-शब्द का चिंतन करते हुए सदैव सावधान रहता है।

33लेकिन कोई बदनसीब मोह-माया में सोया रहता है।

34एक यही सत्य है कि परमात्मा स्वयं करने करवाने वाला है और किसी अन्य से कुछ भी नहीं किया जा सकता॥ १०॥

35जो गुरु के शब्द द्वारा काल को मारकर दूर कर देता है,

36वह परमात्मा का नाम हृदय में धारण कर लेता है।

37सतिगुरु की सेवा से ही उसने परम सुख प्राप्त किया है और वह परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है। ११॥

38जीव-स्त्री द्वैतभाव में बावली होकर भटकती है और

39मोह-माया के दुख में फँसी रहती है।

40अनेक वेष धारण करने से सत्य की प्राप्ति नहीं होती और सतगुरु के बिना परम-सुख नहीं मिलता॥ १२॥

41जब परमात्मा स्वयं ही सब कुछ करवाता है तो फिर किसे दोष दिया जाए।

42जैसा चाहता है, उस मार्ग पर ही जीवों को चलाता है।

43वह स्वयं ही मेहरबान एवं सुख देने वाला है, जैसा उसे मंजूर है, वैसे ही वह जीवों को चलाता है॥ १३॥

44करने एवं भोगने वाला प्रभु ही है और

45संयम एवं युक्ति भी वह स्वयं ही है।

46वह मधुसूदन स्वयं ही निर्मल एवं मेहरबान है, जिसका हुक्म मिटाया नहीं जा सकता है।॥ १४॥

47वे भाग्यवान हैं जिन्हे ईश्वर की पहचान हो जाती है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं