गुरु ग्रंथ साहिब 1042 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1प्यारा नाम बहुत ही मीठा रस है।
2हे हरि ! नानक को युग-युग अपना यश प्रदान करते रहो, तेरा जाप करके अन्त नहीं पा सका। ५॥
3हरि-नाम रूपी हीरा मन में ही प्राप्त होता है और
4मन में ही हरि-नाम जपने से मन को धैर्य हो जाता है।
5जो व्यक्ति कठिन मार्ग पर चलकर भयभंजन परमात्मा को पा लेता है, वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ता॥ ६॥
6गुरु के शब्द द्वारा भक्ति के लिए मन में उमंग की तरंगें पैदा हो गई हैं और
7हरि-यश एवं नाम-पदार्थ ही माँगता हूँ।
8यदि परमात्मा को मंजूर हो तो वह गुरु से मिला देता है और वह समूचे जगत का उद्धारक है॥ ७॥
9जिसने हरि का नाम जपा है, उसे गुरु की शिक्षा प्राप्त हो गई है और
10यमदूत एवं काल भी उसकी सेवा करते हैं।
11उत्तम संगति करने से जीवन-मुक्ति प्राप्त हो जाती है और भयानक जगत्-संसार से उद्धार हो जाता है॥ ८॥
12यह जगत्-सागर तो शब्द-गुरु द्वारा ही पार किया जा सकता है,
13शब्द द्वारा मन की दुविधा मन में ही जल जाती है।
14सत्य, संतोष, दया, धर्म एवं धैर्य रूपी पाँच बाण लेकर ही यम को मारा जा सकता है और दसम द्वार में धनुष चढ़ाया जा सकता है॥ ९॥
15पदार्थवादी जीव शब्द में ध्यान लगाए बिना कैसे मोक्ष पा सकता है।
16शब्द में लगन लगाए बिना आवागमन बना रहता है।
17हे नानक ! गुरु से ही मुक्ति संभव है और पूर्ण भाग्य से ही परमात्मा गुरु से मिलाता है॥ १०॥
18निर्भय सतगुरु सब जीवों का रखवाला है और
19गुरु-परमेश्वर से ही भक्ति प्राप्त होती है।
20शब्द-गुरु से ही ईश्वर पाया जाता है और मन में आनंदमयी अनाहत शब्द बजता रहता है॥ ११॥
21प्रभु निर्भय है, उसके सिर पर कमों का कोई लेखा नहीं है।
22वह स्वयं कर्मो से रहित है और उसकी कुदरत में ही उसे देखा जाता है।
23वह स्वयं निर्लेप, योनि से रहित एवं स्वजन्मा है, हे नानक ! गुरु उपदेशानुसार ही उसे पाया जा सकता है॥ १२॥
24मन की अवस्था सतगुरु ही जानता है।
25जो गुरु के शब्द को पहचान लेता है, वही निडर है।
26वह प्रभु को अपने अन्तर्मन में देखकर बूझ लेता है और उसका मन अन्यत्र दोलायमान नहीं होता॥ १३॥
27निर्भय वही है जिसके अन्तर्मन में सत्य बस गया है और
28वह पावन नाम में ही लीन रहता है।
29हे नानक ! सुसंगति में ही हरि-यश प्राप्त होता है और प्रभु सहज स्वभाव ही साथ मिला लेता है॥ १४॥
30जो भीतर-बाहर प्रभु को ही जानता है,
31निर्लिप्त रहकर अपने सच्चे घर में स्थित हो जाता है।
32तीनों लोकों से ऊपर सर्वत्र परमात्मा ही विद्यमान है, हे नानक ! सत्य नाम का अमृत-रस पा लिया है॥१५॥४॥२१॥
33मारू महला १॥
34कुदरत बनाने वाला अपरंपार है,
35उसके उत्पन्न किए जीव का कोई बल नहीं चल सकता।
36जीवों को पैदा करके वह स्वयं ही भोजन दे रहा है और सब पर उसका हुक्म चला रहा है॥ १॥
37अपना हुक्म चलाकर वह सबमें समा रहा है,
38फिर किसे निकट एवं किसे उससे दूर कहा जाए ?
39गुप्त एवं प्रगट ईश्वर को घट-घट (प्रत्येक शरीर) में देखो, वह सब में व्याप्त है॥ २॥
40जिस जीव को वह साथ मिला लेता है, उसकी सुरति में ही समा जाता है।
41ऐसा जीव गुरु के शब्द द्वारा हरि-नाम का ध्यान करता रहता है।
42ईश्वर आनंद-रूप, अनुपम एवं इन्द्रियातीत है, गुरु को मिलने से सारा भ्रम दूर हो जाता है॥ ३॥
43परमात्मा का नाम मन, तन एवं धन से भी प्रिय है और
44अंतकाल चलते समय वही सहायक होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं