गुरु ग्रंथ साहिब 1041 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1सत्य के बिना जगत्-सागर से पार नहीं हुआ जा सकता,
2यह अथाह समुद्र है, जो महा विष से भरा हुआ है।
3जो गुरु की शिक्षा लेकर वासनाओं से अलिप्त रहता है, वह निर्भय प्रभु के घर में स्थान पा लेता है। ६॥
4दुनिया के मोह की चतुराई झूठी है,
5इससे जन्म-मरण में कोई देरी नहीं लगती।
6अभिमानी आदमी नाम को विस्मृत करके जग से चल देते हैं, जिसके कारण जन्म-मरण के चक्र में दुखी होते हैं।७॥
7वे जन्मते-मरते हैं और बन्धनों में ही फॅसे रहते हैं।
8उनके गले में अहम् और मोह-माया का फंदा पड़ा रहता है।
9जिसने गुरु मतानुसार राम नाम को नहीं बसाया, उसे बाँधकर यमपुरी में भेज दिया गया है॥ ८॥
10गुरु के बिना मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है और
11गुरु बिन राम नाम का मनन कैसे किया जा सकता है।
12गुरुमत को ग्रहण करके दुस्तर भवसागर से पार हो जाओ, जो मुक्ति प्राप्त कर गए हैं, उन्होंने सुख पा लिया है॥ ९॥
13गुरु-मतानुसार श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को ऊँगली पर धारण कर लिया था और
14श्रीराम ने समुद्र पर पत्थर तैरा दिए थे।
15गुरु की मत ग्रहण करने से परमपद प्राप्त होता है। हे नानक ! गुरु ही भ्रम मिटाने वाला है॥ १०॥
16गुरु की शिक्षा प्राप्त करो और सत्य द्वारा भवसागर से पार हो जाओ।
17आत्मा एवं हृदय में ईश्वर को पहचान लो।
18परमात्मा का जाप करने से यम के फंदे कट जाते हैं और मायातीत की प्राप्ति हो जाती है॥ ११॥
19गुरुमत द्वारा ही संत-मित्र एवं गुरुभाई का परस्पर संबंध होता है।
20गुरु की मति तृष्णाग्नि को निवृत कर देती है।
21अपने मन एवं मुख से जीवनदाता ईश्वर का नाम जपो; इस तरह ह्रदय में ही अदृष्ट प्रभु के दर्शन हो जाते हैं। १२॥
22गुरुमुख इस तथ्य को बूझ लेता है और नाम द्वारा संतुष्ट हो जाता है,
23फिर किसकी प्रशंसा एवं निंदा की जाए।
24अपना आप पहचानो, जगदीश्वर का नाम जपो, संसार का स्वामी हरि ही मन को माया है॥ १३॥
25जो खण्ड-ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है, उसे जानो।
26गुरु के सान्निध्य में सत्य को बूझो, शब्द की पहचान करो।
27वह भोगनेवाला ईश्वर घट-घट (प्रत्येक शरीर) में व्याप्त होकर सब पदार्थ भोग रहा है, लेकिन फिर भी सबसे अलिप्त रहता है॥ १४॥
28गुरु-मतानुसार पावन हरि-यश बोलो,
29गुरु-मतानुसार आँखों से प्रभु को देखो।
30हे नानक ! जो कानों से हरि-नाम एवं वाणी सुनता है, वह उसके प्रेम-रंग में ही रंग गया है॥ १५॥ ३॥ २०॥
31मारू महला १॥
32हे मानव जीवो ! काम, क्रोध एवं पराई निंदा को छोड़ दो;
33लालच, लोभ को तज कर निश्चिन्त हो जाओ।
34जो भ्रम की जंजीर तोड़कर निर्लिप्त हो गया है, उसने अन्तर्मन में ही हरि-रस पा लिया है॥ १॥
35जैसे रात्रिकाल कोई बिजली की चमक जैसा प्रकाश देखता है,
36वैसे ही में निशदिन प्रभु-ज्योति को निरंतर देखता हूँ।
37पूर्ण गुरु ने आनंद-स्वरूप एवं अनुपम स्वरूप प्रभु के दर्शन करवाए हैं।॥ २॥
38सतगुरु से साक्षात्कार होने पर प्रभु स्वयं ही जगत्-सागर से पार उतार देता है।
39हृदय रूपी घर में यूं आलोक हो जाता है, जैसे आकाश में दीपक रूपी सूर्योदय होता है।
40उस अदृष्ट ईश्वर को सर्वत्र देखकर उसमें लगन लगाओ, तीनों लोकों में ब्रह्म का ही प्रसार है॥ ३॥
41हरि-नाम रूपी अमृत-रस को पाने से तृष्णा एवं भय का निवारण हो जाता है।
42जो अहम् को मिटा देता है, उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
43जिसने निर्मल शब्द की साधना की है, उसने सर्वोच्च पदवी पा ली है और वह सर्वश्रेष्ठ बन गया है॥ ४॥
44ईश्वर का नाम अदृष्ट एवं इन्द्रियातीत है और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं