गुरु ग्रंथ साहिब 1040 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1वह निरंजन परमपुरुष बड़ा चतुर है, सर्वव्यापी है।
2यह सब जीवों का न्याय करता है और गुरु के ज्ञान द्वारा उसकी प्राप्ति संभव है।
3वह काम, क्रोध को गर्दन से पकड़ कर नष्ट कर देता और अभिमान-लोभ को मिटा देता है॥ ६॥
4निराकार परमात्मा सच्चे स्थान में वास करता है और
5शब्द का चिंतन करने वाला आत्मस्वरूप को पहचान लेता है।
6इस प्रकार जीव का सच्चे घर में निवास हो जाता है और उसका आवागमन मिट जाता है॥ ७॥
7उस योगी का मन इधर-उधर नहीं भटकता और न ही वासना रूपी वायु उसे उड़ाती है,
8जो योगी मन में अनहद शब्द बजाता रहता है,
9उसके मन में पाँच प्रकार की अनहद ध्वनि वाले शब्द की निराली झंकार होती रहती है और प्रभु ने स्वयं ही शब्द को बजाकर सुनाया है॥ ८॥
10जिसके मन में भय-श्रद्धा है, वह वैरागवान होकर सहज ही समाया रहता है।
11वह अहम् को त्यागकर अनहद ध्वनि में रत रहता है और
12ज्ञान रूपी अंजन लगाकर जान लेता है कि निरंजन परमेश्वर सर्वव्यापी है॥ ९॥
13अविनाशी प्रभु सब दुख-भय मिटाने वाला है,
14उसने सारे रोग एवं यम की फाँसी काट दी है।
15हे नानक ! सो प्रभु भय काटने वाला है और गुरु को मिलकर ही उसे पाया जा सकता है॥ १०॥
16निरंजन को जानने वाला काल के भय को भी खा जाता है।
17जो प्रभु-कृपा को बूझता है, वह शब्द को पहचान लेता है।
18ईश्वर स्वयं ही जानता एवं पहचानता है और सब उसकी ही लीला है॥ ११॥
19साहूकार एवं वणजारा वह स्वयं ही है।
20परख करने वाला वह स्वयं ही परख करता है।
21वह स्वयं ही कसौटी-परख करके कीमत लगाता है॥ १२॥
22दयालु प्रभु ने स्वयं ही सब पर दया की हुई है,
23घट-घट सब में व्याप्त है।
24मायातीत परमपुरुष वासना से रहित है और महापुरुष गुरु ही उस परमपुरुष से मेिलाता है॥ १३॥
25चतुर प्रभु सारा अभिमान मिटा देता है और
26द्वैतभाव को मिटाकर अपने रूप का ही दर्शन करवाता है।
27जिस मनुष्य ने अकुल निरंजन का यशगान किया है, वह आशा में रहकर भी निर्लिप्त रहता है॥ १४॥
28अहम् मिटाकर शब्द से ही परम सुख प्राप्त होता है और
29जो चिंतन करता है, वही ज्ञानवान है।
30हे नानक ! ईश्वर का यश एवं गुण गाने से ही सच्चा लाभ उपलब्ध होता है और सत्संगति में ही सच्चा फल प्राप्त होता है॥ १५॥ २॥ १९॥
31मारू महला १॥
32अगर सच्चे घर में रहना है तो सदैव सत्य बोलो,
33अगर जगत् रूपी भवसागर से तैरना है तो जीवित ही मर जाओ अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाओ।
34गुरु जहाज, नैया और तुलहा है, हे मन ! परमात्मा का जाप करने से संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है॥१॥
35जो अभिमान, ममता एवं लोभ को मिटा देता है,
36वह शरीर रूपी नौ द्वारों से मुक्त होकर दसम द्वार में आसन लगा लेता है।
37सबसे ऊपर परे से परे ईश्वर सर्वोपरि है, स्वयंभू है॥ २॥
38गुरु की शिक्षा लो, परमात्मा में लगन लगाने से ही पार हुआ जाता है।
39ईश्वर का गुणगान करने से यम से क्या डरना है।
40हे परमेश्वर ! जिधर जिधर भी देखता हूँ, वहाँ तुम ही विद्यमान हो और तेरे अलावा किसी अन्य का यशगान नहीं किया॥ ३॥
41हरि का नाम सत्य है, उसकी शरण भी शाश्वत है।
42गुरु का शब्द भी सत्य है, जिससे लगकर संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।
43जो अकथनीय प्रभु का कथन करता है, वह उस अपरंपार के दर्शन करके पुनः गर्भ-योनि में नहीं जाता॥ ४॥
44सत्य-नाम के बिना सत्य एवं संतोष प्राप्त नहीं होता;
45गुरु के बिना मुक्ति नहीं होती और जीव आवागमन में ही पड़ा रहता है।
46हे नानक ! परमात्मा का नाम ही मूलमंत्र एवं रसों का घर है और इससे ही पूर्ण परमेश्वर को पाया जाता है॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं