सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 103 · Raag Maajh

1माझ महला ५ ॥

2वहीं वाणी शुभ फलदायक है, जिससे हरि के नाम का जाप किया जाता है।

3कोई विरला ही पुरुष है, जिसने गुरु की कृपा से ऐसी वाणी को समझा है।

4वह समय बड़ा शुभ है, जब परमात्मा का यशोगान किया जाता एवं सुना जाता है। जगत् में जन्म लेकर उनका आगमन ही स्वीकृत है, जो भगवान का यश गाते एवं सुनते हैं ॥ १॥

5भगवान को वहीं नेत्र स्वीकृत होते हैं, जिन्होंने भगवान के दर्शन किए हैं।

6वह हाथ प्रशंसनीय है जो (ईश्वर की) उपमा लिखते हैं।

7वह चरण सुन्दर हैं जो परमेश्वर के मार्ग पर चलते हैं। मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ जिनकी संगति करके मैंने भगवान को पहचान लिया है॥ २॥

8हे मेरे प्रिय मित्र एवं सज्जन ! सुनो,

9भगवान ने मुझे संतों की संगति में मिलाकर एक क्षण में ही मेरा उद्धार कर दिया है।

10उसने मेरे पाप काट दिए हैं और मेरा मन निर्मल हो गया है। अब मेरा जन्म-मरण का चक्र मिट गया है। ३॥

11हे प्रभु ! अपने दोनों हाथ जोड़कर मैं एक प्रार्थना करता हूँ।

12मुझ पर दया कीजिए और डूबते हुए पत्थर को बचा लीजिए।

13भगवान नानक पर दयालु हो गया है और नानक के मन को भगवान ही अच्छा लगता है।॥ ४॥ २२॥ २९ ॥

14माझ महला ५ ॥

15हे हरि-परमेश्वर ! तेरी वाणी अमृत है।

16इस अमृत वाणी को सुन-सुनकर मुझे परमगति प्राप्त हुई है।

17सतिगुरु के दर्शन करके मेरे मन की तृष्णा रूपी जलन बुझ गई है और मेरा मन शीतल हो गया है॥ १॥

18उसे बड़ा सुख प्राप्त होता है और उसके दुख दूर भाग जाते हैं।

19जो सन्तजन अपनी जिव्हा से परमात्मा के नाम का उच्चारण करते हैं ।

20जैसे वर्षा होने से तमाम सरोवर जल से भलीभांति भर जाते हैं, वैसे ही गुरु के पास आया कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं जाता॥ २॥

21सृजनहार प्रभु ने अपनी दया न्यौछावर की है

22और समस्त जीव-जन्तुओं की पालना की है।

23भगवान मेहरबान है, कृपालु एवं बड़ा दयालु है। भगवान की दी हुई नियामतों से सभी जीव-जन्तु तृप्त एवं संतुष्ट हो गए हैं। ॥३॥

24वन, तृण, तीनों लोक प्रभु ने हरे-भरे कर दिए हैं।

25कर्ता परमेश्वर ने एक क्षण में ही यह सब कुछ कर दिया।

26हे नानक ! जो व्यक्ति गुरु के माध्यम से भगवान की आराधना करता है, भगवान उसके मन की आशा पूरी कर देता है॥ ४॥ २३॥ ३०॥

27माझ महला ५ ॥

28हे भगवान ! तू ही मेरा पिता है एवं तू ही मेरी माता है।

29तू ही मेरा रिश्तेदार है और तू ही मेरा भ्राता है।

30जब तू ही समस्त स्थानों में मेरा रक्षक है तो मुझे कैसा भय व चिंता कैसी होगी ॥ १॥

31तुम्हारी दया से मैं तुझे समझता हूँ।

32तू ही मेरी शरण है और तू ही मेरी प्रतिष्ठा है।

33तेरे बिना मेरा अन्य कोई नहीं। यह सारी सृष्टि तेरी एक खेल है और यह धरती जीवों के लिए जीवन खेल का मैदान है॥ २॥

34हे भगवान ! समस्त जीव-जन्तु तूने ही उत्पन्न किए हैं।

35जिस तरह तेरी इच्छा है वैसे ही कार्यों में तूने उन्हें कार्यरत किया है।

36जगत् में जो कुछ भी हो रहा है, सब तेरा ही किया हो रहा है। इसमें हमारा कुछ भी नहीं ॥ ३ ॥

37तेरे नाम की आराधना करने से मुझे महासुख प्राप्त हुआ है।

38हरि प्रभु का यशोगान करने से मेरा मन शीतल हो गया है।

39हे नानक ! पूर्ण गुरु की दया से मैंने काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी विषम मैदान-ए-जंग जीत लिया है और मुझे विजय की शुभकामनाएँ मिल रही हैं॥॥ ४ ॥ २४ ॥ ३१ ॥

40माझ महला ५ ॥

41भगवान अपने भक्तों की आत्मा, प्राण एवं मन का आधार है।

42भक्त भगवान की अपार महिमा-स्तुति गायन करके ही जीते हैं।

43भगवान का नाम अमृत एवं गुणों का भण्डार है और भगवान के भक्त उसका नाम-सिमरन करके बड़ा सुख प्राप्त करते हैं।॥ १॥

44जो व्यक्ति अभिलाषा धारण करके घर से आता है, वह संतों की संगति करके अपना जन्म-मरण का चक्र मिटा लेता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं