गुरु ग्रंथ साहिब 1039 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1तू हमारा दाता हैं और हम तेरे सेवक हैं।
2कृपा करके नामामृत प्रदान करो, गुरु से ज्ञान रत्न का दीपक आलोकेित किया है॥ ६॥
3पॉच तत्वों से यह तन बनाया है,
4उसमें आत्मा के निवास से सुख उत्पन्न हो गया है।
5शुभ कमों के फलस्वरूप उसमें अमृत नाम रूपी फल लग गया है और रत्न सरीखा हरि-नाम मन में ही पा लिया है॥ ७॥
6जिसका मन हरि से संतुष्ट हो गया है, उसे कोई भूख-प्यारा प्रभावित नहीं करती और
7उसने घट-घट में व्याप्त मायातीत ईश्वर द्वारा को जान लिया है।
8वह वैराग्यगन होकर केवल अमृत रस में ही लीन रहता है और गुरु के उपदेश शोभा का पात्र बन गया है॥ ८॥
9जो दिन-रात आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति का कर्म करता है,
10उसने निर्मल ज्योति को जान लिया है।
11उसने आत्मिक रस में लीन होकर रसना से रसीले शब्द द्वारा रसीली ध्वनि वाली बाँसुरी को बजाया है॥ ९॥
12वही रसीली बाँसुरी बजाता है
13जिसे तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है।
14हे नानक ! गुरु-मतानुसार इस विधि को बूझ लो, क्योंकि इससे ही राम नाम में ध्यान लगता है।॥ १०॥
15संसार में ऐसे विरले ही व्यक्ति हैं,
16जो शब्द-गुरु का चिंतन करके निर्लिप्त रहते हैं।
17वे स्वयं तो पार होते ही हैं, संगत में आने वालों का वंशावलि सहित उद्धार कर देते हैं और जग में उनका जन्म सफल हुआ है॥ ११॥
18वही प्रभु के शरीर रूपी घर, द्वार, मन्दिर रूपी दसम द्वार को जान लेता है,
19जिसे पूर्ण गुरु से ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
20महल का मालिक शरीर रूपी गढ़ में ही रहता है और उस परम-सत्य ने हृदय को सच्चा तख्त बनाया हुआ है।॥ १२॥
21चौदह भवन एवं सूर्य-चाँद रूपी दो दीये साक्षी हैं कि
22सेवक-पंचों ने माया रूपी विष को नहीं चखा।
23उनके हृदय में अनुपम अमूल्य नाम-वस्तु विद्यमान है और गुरु से मिलकर उन्होंने हरिनाम रूपी धन पा लिया है॥ १३॥
24हृदय रूपी तख्त पर वही बैठता है जो योग्य होता है।
25गुरु ये सेवक पंच सत्य में ही लीन रहते हैं।
26आदि-जुगादि से एक ईश्वर ही है, अब भी है, भविष्य में भी उसका ही अस्तित्व होगा। जिसने इस रहस्य को जान लिया है, उसका भ्रम एवं सन्देह दूर हो गया है॥ १४॥
27हृदय रूपी तख्त पर उस विराजमान को दिन-रात नमन होता है।
28ईश्वर का यह बड़प्पन है, गुरु की शिक्षा द्वारा ध्यान लगाने से ही उसे जाना जाता है।
29हे नानक ! राम नाम जपने से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है और अन्त में वही सहायक साथी प्राप्त होता है॥१५॥१॥१८॥
30मारू महला १॥
31हे मेरे भाई, भक्तजनो ! हरि-नाम धन संचय करो;
32सतगुरु की सेवा में तल्लीन रहो और उसकी शरण में पड़े रहो।
33इस धन को कोई तस्कर अथवा चोर चुरा नहीं सकता, क्योंकि शब्द ध्वनि द्वारा मन सावधान रहता है॥ १॥
34हे परमात्मा ! तू एकाकार है, मोह-माया से निर्लिप्त है, समूचे विश्व का बादशाह है।
35तू स्वयं ही अपने भक्तजनों के कार्य संवारता है।
36अमर, अडोल, अपरंपार, अमूल्य ईश्वर का अटल स्थान भी बहुत सुन्दर हैं।॥ २॥
37शरीर रूपी नगरी उत्तम स्थान है,
38जहाँ सत्य, संतोष, नम्रता इत्यादि पाँच लोग रहते हैं।
39इन सबके ऊपर एक ऑकार निर्लिप्त होकर शून्य समाधि लगाए बैठा हुआ है॥ ३॥
40ऑखें, कान, नाक, मुँह इत्यादि शरीर रूपी नगरी के नौ द्वार हैं,
41सबकी रचना उस रचयिता ने की है।
42सबसे निराला एवं मायातीत प्रभु दसम द्वार में रहता है और उस परमपुरुष ने स्वयं ही अपने अदृष्ट रूप को दिखाया है॥ ४॥
43कर्मों से रहित उस परमपुरुष का दीवान (न्यायालय) शाश्वत है,
44वह सब पर अपना हुक्म चलाता है और उसका नाम रूपी परवाना अटल है।
45हे नानक ! ह्रदय-घर में परमात्मा को खोज लो, क्योंकि आत्मा में ही राम नाम पाया जा सकता है॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं