गुरु ग्रंथ साहिब 1038 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद-
2ब्रह्मा के मुख से निकले त्रिगुणात्मक माया रूपी ही हैं।
3प्रभु महिमा की सही कीमत कोई नहीं ऑक सकता, जीव वैसे ही बोलता है, जैसे वह बुलाता है॥ ९॥
4शून्य से ही सात पाताल उत्पन्न किए,
5शून्य में ही विश्व को उत्पन्न किया और सब ईश्वर में ही ध्यान लगाते हैं।
6हे परमेश्वर ! तूने स्वयं यह जगत्-प्रसार किया है और सब जीव वही करते हैं, जो तू करवाता है॥ १०॥
7रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण की शक्ति तेरी ही छाया है।
8तूने जीव में अभिमान का दुख डाला हुआ है जो जन्म-मरण का कारण है।
9जिस पर परमात्मा कृपा करता है, वह गुरु के सान्निध्य में चौथे गुण को ग्रहण करके मुक्ति पा लेता है॥ ११॥
10शून्य से दस अवतार उत्पन्न हुए,
11सृष्टि को उत्पन्न करके समूचा प्रसार किया।
12उसने देव, दानव, गण एवं गंधर्व की रचना की और सभी जीव भाग्यानुसार ही कर्म करते हैं।॥ १२॥
13गुरु के सान्निध्य में जो इस तथ्य को समझ लेता है, उसे कोई रोग नहीं लगता।
14कोई विरला ही गुरु के मार्ग को जानता है।
15यह मार्ग युग-युगान्तरों से मुक्ति पाने का साधन है, जो बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर गया है, उसे प्रभु के द्वार पर शोभा मिली है॥ १३॥
16शून्य से ही पंच तत्वों का प्रकाश हुआ और
17इन तत्वों के संयोग से देह बनकर कमों का अभ्यास करती है।
18बुरा भला दोनों प्रकार के कर्म माथे पर लिखे हुए हैं और जीव पाप-पुण्य बोता है॥ १४॥
19सतिगुरु उत्तम पुरुष एवं निराला है,
20जो शब्द में रत रहकर हरि-रस में मतवाला बना रहता है।
21ऋद्धियां, सिद्धियां, बुद्धि एवं ज्ञान गुरु से ही प्राप्त होते हैं और पूर्ण भाग्य से ही (गुरु से) निलाप होता है॥ १५॥
22इस मन को माया से बहुत प्रेम लगा हुआ है।
23चाहे ज्ञानी पुरुषों से बूझकर इस तथ्य का कोई निर्णय कर लो।
24लोभी आदमी झूठ में ही लिप्त रहता है और उसे आशा, तृष्णा, अभिमान एवं सन्देह का रोग लगा रहता है। १६॥
25जो व्यक्ति सतगुरु से ज्ञान पा लेता है,
26वह शून्य समाधि द्वारा सच्चे प्रभु में निवास पा लेता है।
27हे नानक ! फिर मन में शब्द की ध्वनि से निर्मल नाद सुनाई देता है और वह सच्चे राम नाम में समा जाता है॥ १७॥ ५॥ १७॥
28मारू महला १॥
29जहाँ देखता हूँ, वहाँ दीनदयाल है।
30वह कृपालु प्रभु न आता है, न जाता है।
31जीवों में जीने की युक्ति समाई हुई है, लेकिन परमात्मा निर्लिप्त रहता है॥ १॥
32यह जग स्वयंभू ईश्वर की छाया है, जिसका कोई बाप एवं माँ नहीं,
33न उसकी कोई बहिन है और न ही उसने कोई भाई बनाया।
34न उसका जन्म होता है, न ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है, उसकी कोई कुल-जाति भी नहीं है, अतः वह अजर-अमर ईश्वर ही मन को भाया है॥ २॥
35हे परमेश्वर ! तू कालातीत है, तेरे सिर पर काल का कोई भय नहीं।
36तू परमपुरुष है, कर्मों के लेखे से रहित है, जीवों की पहुँच से परे एवं जग से निराला है।
37जिसने श्रद्धा-भावना से ध्यान लगाया है, शब्द द्वारा उसके मन में सत्य, संतोष एवं शान्ति पैदा हो गई है। ३॥
38संसार में त्रिगुणों का प्रसार करके तू तुरीयावस्था में रहता है,
39तूने विकराल काल को ग्रास बना लिया।
40हे संसार के जीवनदाता ! तेरी निर्मल ज्योति सब में व्याप्त है और गुरु ने अनहद शब्द द्वारा तेरा दर्शन करवा दिया है॥ ४॥
41हे प्यारे प्रभु ! तेरे संतजन भले एवं उत्तम हैं,
42वे हरि रस में मस्त होकर पार हो गए हैं।
43नानक तो उन संतजनों की चरणरज बन चुका है और गुरु की कृपा से उनकी संगति में ईश्वर को पाया है॥ ५॥
44तू अन्तर्यामी है, सभी जीव तेरी रचना हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं