सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1037 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1जो गुरुमुख होता है, वही ईश्वर के हुक्म को पहचानता और मानकर उसके हुक्म में ही समा जाता है।॥ ९॥

2प्रत्येक जीव ईश्वर के हुक्म से ही पैदा हुआ है और हुक्म से ही उसमें विलीन हो गया है।

3समूचा दृष्टिमान जगत् उसके हुक्म से ही उत्पन्न हुआ है।

4उसके हुक्म में स्वर्गलोक, मृत्युलोक एवं पाताललोक की रचना हुई और हुक्म से ही उसने इनमें शक्ति स्थित की॥ १०॥

5ईश्वर के हुक्म में ही धर्म रूपी बेल ने सिर पर धरती का भार उठाया हुआ है।

6उसके हुक्म से ही पवन एवं पानी कार्यशील हैं।

7उसके हुक्म में ही शिव (जीव) ने शक्ति (माया) के घर में वास किया हुआ है और हुक्म में ही जीवन रूपो खेल खेलाता है॥ ११॥

8हुक्म में आकाश का प्रसार है,

9उसके हुक्म में ही तीनों लोकों के वासी जीव जल एवं थल में रहते हैं।

10उसके हुक्म में ही जीव सॉस-ग्रास लेता है और पुनः हुक्म में ही देखता एवं दिखाता है॥ १२॥

11ईश्वर के हुक्म के अन्तर्गत ही दस अवतार (मच्छ, कच्छ, वाराह, नृसिंह, वामन, राम, कृष्ण, परशुराम इत्यादि) पैदा हुए और

12हुक्म में ही असंख्य देव-दानव उत्पन्न किए।

13जो उसके हुक्म को मानता है वही उसके दरबार में शोभा का पात्र बनता है और परम-सत्य में ही विलीन हो जाता है॥ १३॥

14हुक्म में ही ईश्वर ने छत्तीस युग शून्य समाधि में व्यतीत कर दिए।

15चिंतनशील सिध-साधक उसके हुक्म से ही पैदा हुए हैं।

16वह सृष्टि का मालिक है और सब उसके नियंत्रण में है। जिस पर कृपा करता है, उसे मुक्त कर देता है॥ १४॥

17शरीर रूपी किले में मन राजा है। कर्मन्द्रियाँ एवं ज्ञानेन्द्रियाँ इसके नायब एवं खास सेवक हैं और मुंह इसका दरवाजा है।

18किन्तु मिथ्या लोभ के कारण जीव को सच्चे घर में वास नहीं मिलता और लालच, पाप के कारण पछताता है॥ १५॥

19सत्य एवं संतोष भी शरीर रूपी नगर में अधिकारी हैं,

20जो यतीत्व, सदाचार एवं संयम द्वारा मन रूपी राजा को ईश्वर की शरण में जाने के लिए प्रेरित करते हैं।

21हे नानक ! ईश्वर सहज स्वभाव ही मिलता है और शब्द-गुरु द्वारा ही जीव को सम्मान प्राप्त होता है॥१६॥४॥१६॥

22मारू महला १॥

23ईश्वर ने सर्वप्रथम शून्य समाधि धारण की थी,

24वह अपरंपार स्वयं निर्लिप्त था।

25वह स्वयं ही कुदरत को उत्पन्न कर करके देखता है और शून्य समाधि में शून्य से सब उत्पन्न करता है॥ १॥

26शून्य से उसने पवन-पानी का निर्माण किया,

27सृष्टि उत्पन्न करके शरीर रूपी किले में मन रूपी राजा को पैदा किया।

28हे ईश्वर ! अग्नि, पानी एवं जीव में तुम्हारी ही ज्योति है और समूची शक्ति शून्य में ही स्थिर की हुई है । २॥

29शून्य से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश उत्पन्न किए,

30सभी युग शून्य में ही बीत गए।

31इस पद को जो व्यक्ति विचार लेता है, वही पूर्ण ज्ञानी है और उससे मिलकर भ्रम दूर हो जाता है।॥ ३॥

32शून्य में ही परमेश्वर ने सात सरोवर (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन-बुद्धि) बनाए,

33जिसने इसे बनाया है, वह स्वयं ही इनका विचार करता है।

34जिस गुरुमुख का मन इन सात सरोवरों में स्नान करता है, वह पुनः योनि-चक्र में नहीं पड़ता॥ ४॥

35शून्य से ही उसने चाँद, सूर्य एवं गगन बनाए और

36उसकी ज्योति तीनों लोकों में फैली हुई है।

37अलख, अपार निर्लिप्त परमात्मा स्वयं भी शून्य में ही समाया हुआ है और शून्य में ही समाधि लगाता है॥ ५॥

38शून्य से ही धरती एवं आकाश उत्पन्न किए और

39बिना स्तम्भ के अपनी सत्य की शक्ति से स्थित किया हुआ है।

40उसने तीनों लोकों की रचना करके उन्हें माया रूपी रस्सी से बांध रखा है और वह स्वयं ही पैदा करके नष्ट भी कर देता है॥ ६॥

41शून्य से ही जीवों की उत्पत्ति के चारों स्रोत अस्तित्व में आए और शून्य से ही चारों वाणियों आई।

42ये सब शून्य से उत्पन्न होकर शून्य में ही विलीन हो गए।

43करतार ने अपने शब्द द्वारा वनस्पति की रचना करके एक बड़ी अद्भुत लीला कर दिखाई है॥ ७॥

44दिन और रात दोनों ही उसने शून्य से उत्पन्न किए और

45इसी से जीवों को जन्म-मरण, दुख-सुख दिए हैं।

46गुरुमुख सुख-दुख से रहित होकर अमर हो गया और उसने अपने सच्चे घर में स्थान पा लिया॥ ८॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं