सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1036 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1तब ब्राह्मण-क्षत्रिय इत्यादि वर्ण एवं सम्प्रदाय तक नहीं था,

2कोई देवता, मन्दिर, गाय एवं गायत्री (मंत्र) का भी अस्तित्व नहीं था,

3उस समय होम, यज्ञ एवं तीर्थ-स्नान भी नहीं था और न ही कोई पूजा-अर्चना में लीन होता था॥ १०॥

4तब कोई मुल्ला-मौलवी, काजी,

5शेख अथवा हाजी भी नहीं था।

6राजा-प्रजा, दुनिया का अहंकार, कोई कहने-कहलवाने वाला भी नहीं होता था।॥ ११॥

7आस्था, प्रेम, भक्ति, शिव-शक्ति,

8साजन, मित्र, वीर्य-रक्त कुछ भी नहीं था।

9तब परमात्मा स्वयं ही साहूकार एवं व्यापारी था और सत्यस्वरूप को यही स्वीकार था॥ १२॥

10वेद, कुरान, स्मृतियाँ एवं शास्त्र भी नहीं थे;

11तब न कोई पुराणों का पाठ होता था और न ही सूर्योदय एवं अस्त होता था।

12अपहुँच, इन्द्रियातीत निरंकार स्वयं ही कहता-वक्ता था; वह अलख है और स्वयं ही दिखाता है॥ १३॥

13जब उसकी मर्जी हुई तो उसने जगत् को उत्पन्न कर दिया;

14उसने बिना शक्ति के सारी रचना को आधार प्रदान किया।

15उसने ब्रह्मा (उत्पन्न करने वाले), विष्णु (पोषक), महेश (संहारक) इन त्रिदेवों को उत्पन्न करके मोह-माया में वृद्धि कर दी।॥ १४॥

16गुरु ने किसी विरले को ही शब्द सुनाया है,

17वह जीवों को पैदा कर करके सबकी देखभाल करता है और उसका हुक्म सब पर चलता है।

18उसने खण्ड, ब्राहाण्ड एवं पाताल को बनाना आरम्भ कर दिया और अपने गुप्त निराकार रूप से साकार रूप में प्रगट हो गया॥ १५॥

19उसका रहस्य कोई भी नहीं जानता और

20पूर्ण गुरु से ही उसकी सूझ प्राप्त होती है।

21हे नानक ! जो सत्य में लीन हो गए, वे आश्चर्यजनक लीला को सुनकर चकित हो गए और उन्होंने परमात्मा का ही गुणगान किया॥ १६॥ ३॥ १५॥

22मारू महला १॥

23वह स्वयं ही जग को उत्पन्न करके निर्लिप्त हो गया,

24उस दीनदयाल ने रहने के लिए जग रूपी सच्चा स्थान बनाया।

25फिर पवन, पानी, अग्नि इत्यादि पंच तत्वों का संगठन करके शरीर रूपी किला बना दिया॥ १॥

26सृजनहार ने शरीर रूपी किले में ऑख, कान, मुँह इत्यादि नौ घरों की सृजना की और

27उस अलख-अपार ने अपना निवास दसम द्वार में कर लिया।

28गुरुमुख के सात सरोवर (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि) नामामृत के पावन जल से भर दिए, जिसे कोई मैल नहीं लगती॥ २॥

29सूर्य एवं चाँद रूपी दीपक में परमात्मा की ज्योति ही समाई हुई है।

30वह स्वयं ही बनाकर अपनी बड़ाई को देखता रहता है।

31ज्योति-स्वरूप परमेश्वर सदैव सुख देने वाला है और सत्यशील जीव सत्य में लीन होकर ही शोभा प्राप्त करता है।॥ ३॥

32शरीर रूपी किले में नगर एवं बाजार हैं, जिसमें नाम का व्यापार होता है।

33ईश्वर रूपी व्यापारी पूर्ण तौल से नाम रूपी वस्तु को तौलता है।

34वह स्वयं ही नाम-रत्नों को खरीदता है और स्वयं ही उसकी सही कीमत आंकता है॥ ४॥

35मूल्यांकन करने वाले प्रभु ने स्वयं ही नाम-रत्न का मूल्यांकन किया है,

36उस बेपरवाह प्रभु के भण्डार भरे हुए हैं।

37वह अपनी सर्व शक्तियों सहित स्वयं ही सब में समाया हुआ है परन्तु इस तथ्य की सूझ किसी गुरुमुख को ही होती है॥ ५॥

38अगर उसकी कृपा-दृष्टि हो जाए तो पूर्ण गुरु से भेंट हो जाती है और

39निर्दयी यम भी पीड़ित नहीं करता।

40जैसे कमल का फूल जल में खिला हुआ है, वैसे ही वह स्वयं ही खिलकर ध्यान करता रहता है।॥ ६॥

41वह स्वयं ही अमृत धारा की वर्षा करता है और उसका अपार नाम ही रत्न, जवाहर एवं लाल समान है।

42अगर सतिगुरु मिल जाए तो प्रेम के फलस्वरूप ही पूर्ण प्रभु प्राप्त होता है॥ ७॥

43जो अमूल्य प्रेम पदार्थ को पा लेता है, वह कभी कम नहीं होता।

44जब भी उसे तोलो, वह पूरा होता है।

45वह सत्य का ही व्यापारी होता है और सच्चा सौदा ही लादता है॥ ८॥

46यह सच्चा सौदा कोई विरला पुरुष ही प्राप्त करता है।

47अगर पूर्ण सतगुरु मिल जाए तो वह मिला देता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं