सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1034 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1जब अनहद शब्द बजता है तो मन में से भ्रम-भय दूर हो जाते हैं।

2प्रभु सब जीवों में व्याप्त हो रहा है और सब पर अपनी छाया कर रहा है।

3हे ईश्वर ! सारी दुनिया तेरी ही बनाई हुई है, तू गुरु के भाध्यम से ही जाना जाता है और तेरे द्वार पर गुणगान करने वाला ही शोभा का पात्र बनता है॥ १०॥

4जगत् का आदि, निरंजन, निर्मल वही है,

5उसके अलावा मैं किसी दूसरे को बड़ा नहीं मानता।

6जब ऑकार मन में बस जाता है तो वही मन को भाता है और अभिमान एवं घमण्ड को दूर कर देता है॥ ११॥

7जो नामामृत पान किया है, मुझे सतगुरु ने दिया है।

8अब किसी दूसरे-तीसरे को मैं नहीं जानता।

9ईश्वर एक ही है, सबसे बड़ा एवं अपरंपार है, वह स्वयं ही जीवों को परखकर अपने कोष में मिला लेता है॥ १२॥

10हे सत्यस्वरूप ! तू गहन-गंभीर है, मुझे ज्ञान-ध्यान प्रदान करो,

11तेरा रहस्य कोई नहीं जानता।

12जितनी भी यह दुनिया है, सब तुझसे ही माँगती है परन्तु जिस पर कृपा करता है वही पाता है। १३॥

13धर्म-कर्म सब तेरे हाथ में है,

14तू बेपरवाह है और तेरा भण्डार कभी कम नहीं होता।

15हे प्रभु ! तू बड़ा दयालु एवं सदैव कृपा करने वाला है और स्वयं ही मिलाता है॥ १४॥

16वह स्वयं ही देखता-दिखाता है

17और स्वयं ही बनाता-बिगाड़ता है,

18संयोग-वियोग एवं मारने-जिंदा रखने वाला ईश्वर ही है॥ १५॥

19यह जितनी भी दुनिया है, तेरे विराट रूप शरीर में वसती है!

20तू स्वयं अपने मन्दिर में बैठकर रचना को देखता रहता है।

21नानक विनयपूर्वक सत्य ही कहता है कि ईश्वर के दर्शन से ही सुख उपलब्ध होता है॥ १६॥ १॥ १३॥

22मारू महला १॥

23हे परमात्मा ! तेरे दर्शन तो ही कर सकता हूँ.

24अगर तु चाहता है तेरी भक्ति तेरे ही गुण गाता रहूँ।

25हे रचयिता ! तेरी इच्छा से ही तू हमें भाता है और तू ही हमारी जीभ में मिठास डालता है॥ १॥

26भक्तगण प्रभु के दरबार में ही सुन्दर लगते हैं।

27हे ईश्वर ! तेरे दास बन्धनों से मुक्त हो गए हैं।

28वे अपना अहम् मिटाकर तेरे रंग में लीन रहते हैं और दिन-रात तेरे नाम का ध्यान करते रहते हैं।॥ २॥

29शिवशंकर, ब्रह्मा, देवी-देवता,

30देवराज इन्द्र, तपस्वी एवं मुनि सब तेरी उपासना में लीन रहते हैं।

31ब्रह्मचारी-संन्यासी वनों में रहते हैं, परन्तु कोई भी तेरा रहस्य नहीं पा सका।॥ ३॥

32बिना जानकारी कोई भी तुझे जान नहीं सकता।

33जो कुछ भी तू करता है, अपनी मर्जी से ही करता है।

34तूने चौरासी लाख योनियों के जीव पैदा किए हैं परन्तु अपनी मर्जी से उन्हें साँस लेने देता है॥ ४॥

35जो उसे मंजूर है, वह निश्चय होता है।

36स्वेच्छाचारी खुद को बड़ा मानता है रोता रहता है।

37वह नाम को भुलाकर कहीं भी ठिकाना प्राप्त नहीं करता और जन्म-मरण के चक्र में दुख प्राप्त करता है॥ ५॥

38यह काया निर्मल है, आत्मा भी उज्ज्वल है और

39इस में ही निरंजन नाम का अंश है।

40जो सभी दुखों को अमृत समान समझकर पान कर जाता है, वह कभी दुखी नहीं होता।॥ ६॥

41अधिक स्वादों से दुख ही प्राप्त होता है और

42भोग-विलास करने से अनेक रोग पैदा हो जाते हैं, इस प्रकार अन्त में प्राणी ख्वार होता है।

43खुशी से पैदा हुई चिन्ता कभी मिटती नहीं और ईश्वरेच्छा को न मानने से जीव भटकता रहता है।॥ ७॥

44ज्ञानविहीन सारी दुनिया भटकती रहती है।

45परमात्मा सर्वव्यापक है परन्तु इस बात की सूझ उसमें ध्यान लगाने से ही होती है।

46जिसने निर्भय होकर शब्द-गुरु को सत्य स्वीकार कर लिया है, उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई है॥ ८॥

47ईश्वर अटल, अडोल एवं अतुलनीय है।

48वह क्षण में ही नष्ट कर देता है और फिर बना भी देता है।

49उसकी कोई रूप-रेखा एवं विस्तार नहीं, उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता और शब्द द्वारा भेद पाकर ही जीव संतुष्ट होता है।९॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं