गुरु ग्रंथ साहिब 1033 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1हर कोई अपनी इच्छा से ही बोलता है
2और स्वेछाचारी द्वैतभाव के कारन बोलना ही नहीं जनता।
3अंधे की बुद्धि एवं बोली अंधी है है इसीलिए वह जन्म-मरण का दु:ख भोगता है॥ ११॥
4वह दुख में जन्म लेता और दुख में ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
5गुरु की शरण के बिना उसका दुःख नहीं मिटता
6वह दुःख में ही पैदा होता है और दुख में ही नष्ट हो जाता है, वह क्या लेकर आया और क्या लेकर जाता है॥ १२॥
7जो कार्य गुरु ने जीव को सौंपा है, वही कार्य सत्यशील है,
8इससे जन्म-मरण नहीं होता और न ही यम के कानून की कोई धारा लागू होती है।
9वह जगत् रूपी पेड़ की डालियों अर्थात् देवी-देवताओं को छोड़कर मूल परमात्मा के चरणों में आ गया है और उसके मन में मिलन के लिए सच्ची उमंग पैदा हो गई है॥ १३॥
10ईश्वर के उपासक को यम नहीं मारता और
11न ही वह भयानक मार्ग के दुख को देखता है।
12वह अपने हृदय में राम-नाम की पूजा करता रहता है और उसे अन्य कोई झंझट नहीं पड़ता॥ १४॥
13हे ईश्वर ! तेरी स्तुति करने का कोई अंत नहीं है,
14जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही तेरी इच्छा में रहते हैं,
15सच्चे प्रभु के हुक्म से सहज ही दरंबार में सुख की अनुभूति होती है॥ १५॥
16सभी गुण कथन करते हैं, मगर ईश्वर के गुणों के बारे में क्या कहा जाए;
17जब बड़े-बड़े देवी-देवता भी अन्त नहीं पा सके।
18नानक प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर ! सत्य से मिलाकर हमारी लाज रखो, केवल तू ही बादशाहों का भी बादशाह है॥ १६॥ ६॥ १२॥
19मारू महला १॥
20नगर-किले में से मानव-शरीर भी एक नगर ही है और
21गगनंतर पुरी अर्थात् दसम द्वार में सत्यस्वरूप ईश्वर का निवास है।
22यह दसम द्वार रूपी स्थिर स्थान सदैव निर्मल रहता है और वह स्वयं अपने आपको उत्पन्न करता है॥ १॥
23इस किले में छज्जे और बाजार हैं।
24वह स्वयं ही वस्तु लेता और उसकी संभाल करता है।
25इस किले को वज कपाट जड़े हुए हैं, जिनको वह खुद ही जड़ित करना जानता है और इन कपाटों को शब्दगुरु द्वारा ही खोलता है॥ २॥
26शरीर रूपी किले में दसम द्वार रूपी गुफा है, जहाँ परम-सत्य का घर है।
27उसने हुक्म से ही शरीर रूपी नगर में ऑख, नाक, कान, इत्यादि नौ घर बनाए हुए हैं।
28दसम द्वार में अपरंपार, अलक्ष्य ईश्वर स्वयं रहता है और अदृश्य स्वयं ही अपने आपको प्रगट करता है॥ ३॥
29पवन, पानी, अग्नि इत्यादि पंच तत्वों से बने हुए शरीर रूपी नगर में प्रभु ने ही वास किया हुआ है और
30समूचा खेल-तमाशा उसने स्वयं ही बनाया है।
31जो जलती हुई अग्नि पानी से बुझ जाती है, वह स्वयं ही अग्नि (बड़वाग्नि) समुद्र में डाल देता है॥ ४॥
32धरती को उत्पन्न करके उसने जीवों को धर्म करने के लिए धर्मशाला बना दी है।
33जगत् की उत्पति एवं प्रलय होता रहता है किन्तु वह स्वयं निराला ही रहता है।
34उसने हर जगह पवन (प्राणों) का खेल रचा है और स्वयं ही अपनी शक्ति को खींचकर प्राणों का खेल नष्ट कर देता है॥ ५॥
35हे ईश्वर ! अठारह भार वाली यह वनस्पति तेरी मालिन है,
36पवन का चक्कर तुझ पर चॅवर झूल रहा है।
37सूर्य एवं चाँद रूपी दो दीपक आलोकित किए हुए हैं और चाँद के घर में सूर्य समा जाता है अर्थात् सूर्य से ही चन्द्रमा को प्रकाश मिलता है॥ ६॥
38गुरुमुख रूपी पेड़ से ज्ञानेन्द्रियों रूपी पक्षी उड़कर नहीं जाते।
39शरीर रूपी पेड़ सुन्दर नाम रूपी फल से भरपूर है और वे पक्षी यह अमृतमयी फल पाते हैं।
40गुरुमुख सहज ही गुणगान करते हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ रूपी पक्षियों को हरि-नाम रूपी चोगा चुगाते रहते हैं।॥ ७॥
41मन में सत्य की ज्योति चमक रही है।
42न चन्द्रमा है, न कोई तारा है, न सूर्य की किरणे हैं और न आसमान वाली बिजली है।
43मैं अकथनीय अवस्था का कथन कर रहा हूँ, जिसका कोई चक्र-चिन्ह नहीं और मन भवन प्रभु सब में समां रहा है॥ ८॥
44किरणों का प्रसार होने से सर्वत्र उजाला हो गया।
45दयालु परमेश्वर स्वयं उत्पन्न करके देखता रहता है।
46सुरीली ध्वनि वाला अनहद शब्द सदैव निर्भय प्रभु के द्वार रूपी घर में बजता रहता है॥ ९॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं