गुरु ग्रंथ साहिब 1031 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1तू अभिमान एवं ममत्व करता हुआ जगत् में आया है,
2तेरी आशा एवं लालसाओं ने तुझे बांधकर चलाया है।
3‘मैं-मेरी' करके यहाँ क्या लेकर चले हो। तुम तो माया रूपी विकारों की राख लादकर ले चले हो॥ १५॥
4हे मेरे भाई ! भगवान की भक्ति करो;
5अकथनीय प्रभु की कथा करो ताकेि असंयमित मन मन में ही समा जाए।
6इधर-उधर भटकते मन को हृदय-घर में स्थिर करके रखो, ईश्वर ही सब दुख काटने वाला है॥ १६॥
7जिसने पूर्ण गुरु की ओट ले ली है,
8उसकी गुरु के सान्निध्य में परमात्मा में लगन लगी रहती है और उसने मुक्ति की विधि जान ली है।
9हे नानक ! राम नाम द्वारा जिसकी मति उत्तम हो जाती है, परमात्मा क्षमा करके उसका उध्दार कर देता है।॥१७॥४॥१०॥
10मारू महला १॥
11हे गुरुदेव ! हम तुम्हारी शरण में आए हैं,
12तू सर्वशक्तिमान एवं दयालु है।
13तेरी लीलाएँ कोई नहीं जानता, तू पूर्ण पुरुष विधाता है॥ १॥
14तू युग-युगांतरों रो सबका पोषण कर रहा है,
15हे अनुपम रूप वाले दयालु प्रभु ! तू सब में समाया हुआ है,
16जैसा तुझे मंजूर है, वैसे ही जीवों को चलाता है, सब कुछ तेरा किया ही हो रहा है॥ २॥
17हे संसार के जीवनदाता ! सब के अन्तर्मन में तेरी ही ज्योति विद्यमान है,
18तू खुद ही सब शरीरों को भोगता है और आनंद करता है।
19जगत्-पिता प्रभु तीनों लोकों का दाता है, वह खुद ही नियामतें देता और खुद ही वापिस ले लेता है॥ ३॥
20उसने जगत् को उत्पन्न करके एक खेल रचाया हुआ है और
21पवन, पानी, अग्नि इत्यादि पंच तत्वों से शरीर का निर्माण करके इसमें प्राण डाल दिए।
22शरीर रूपी नगर को दो आँखें, दो कान, मुँह, नाक इत्यादि नौ द्वार लगा दिए परन्तु दसम द्वार उसने गुप्त रखा॥ ४॥
23शरीर में हिंसा, मोह, लोभ एवं क्रोध रूपी भयानक अग्नि की चार नदियां बहती हैं और
24माया से निर्लिप्त कोई विरला गुरुमुख ही शब्द द्वारा इस भेद को समझता है।
25पदार्थवादी जीव दुर्मति के कारण इन नदियों में डूबता एवं जलता रहता है, लेकिन परमात्मा की लगन में लीन रहने वाले की गुरु स्वयं रक्षा करता है॥ ५॥
26जगत्-रचना जल, अग्नि, पवन, पृथ्वी एवं आकाश इन पंच तत्वों से हुई है और
27इन पंच तत्वों से बने हुए शरीर रूपी घर में ही आत्मा का निवास है।
28जो सतगुरु के शब्द द्वारा प्रभु-रंग में लीन रहता है, वह माया, अभिमान, भ्रांतियों को त्याग देता है। ६॥
29यह मन ब्रह्म-शब्द में भीगकर ही संतुष्ट होता है,
30नाम के बिना क्या सहारा ले सकता है।
31पदार्थवादी जीव माया के उन दूतों से परिचित ही नहीं जो अहम् रूपी चोर हृदय-घर एवं शरीर रूपी मन्दिर को लूटता जा रहा है॥ ७॥
32कामादिक के भयानक भूत रूपी दूत शरीर में ही हैं,
33जो प्रेत की तरह खींचतान करते हैं।
34शब्द-सुरति का अभ्यास किए बिना जीव आता-जाता है और अपनी प्रतिष्ठा गॅवा कर आवागमन में पड़ा रहता है॥ ८॥
35यह तन नाशवान है, जो रेत की तरह भस्म बनकर ढेरी हो जाता है।
36हे भाई ! नाम के बिना तेरी कैसी प्रतिष्ठा है ?
37बन्धनों में फँसा हुआ चारों युग मुक्ति नहीं पा सकता, काल एवं यमदूतों ने बाखूबी पहचाना होता है॥ ९॥
38यम के द्वार पर बँधे हुए को कठोर सजा मिलती है और
39उस अपराधी की कोई गति नहीं होती।
40वह गिड़गिड़ाकर बहुत रोता-चिल्लाता है, जैसे कुण्डी में फँसी हुई मछली तड़पती है॥ १०॥
41पदार्थवादी जीव अकेला ही यम की फाँसी में पड़ता है।
42यम उसे अपने वश में कर लेता है और वह अन्धा बहुत दुखी होता है।
43राम नाम के बिना मुक्ति पाने का कोई साधन नहीं सूझता और आज अथवा कल में ही नष्ट हो जाता है॥ ११॥
44सच्चे गुरु के बिना अन्य कोई साथी नहीं है,
45लोक-परलोक दोनों में प्रभु ही रक्षा करता है।
46गुरु कृपा करके राम नाम देता है और परमात्मा से यूँ मिलाता है, जैसे जल जल में मिलकर एक रूप हो जाता है॥ १२॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं