गुरु ग्रंथ साहिब 102 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1परमात्मा के सेवक ईश्वर की प्रीति का आनन्द भोगते हैं।
2जो कुछ परमात्मा का है, वही उसके सेवक का है। सेवक अपने परमात्मा की संगति में जगत् में लोकप्रिय होता है। ॥३॥
3जिसको उसका परमात्मा प्रतिष्ठा की पोशाक पहनाता है, उसे फिर बुलाकर उसके कर्मों का लेखा नहीं पूछता।
4हे नानक ! मैं उस सेवक पर सदैव कुर्बान हूँ जो प्रभु की तरह अथाह, गंभीर एवं अमूल्य मोती बन जाता है।॥४॥१८॥२५॥
5माझ महला ५ ॥
6सब कुछ शरीर रूपी घर में ही है और शरीर से बाहर कुछ भी नहीं है।
7जो व्यक्ति भगवान को हृदय से बाहर ढूंढता है, वह भ्रम में पड़कर भटकता रहता है।
8गुरु की दया से जिसने भगवान को हृदय में पाया है, वह अन्दर एवं बाहर से सुखी है॥ १॥
9उसके अन्दर नाम रूपी अमृत की धारा रिमझिम कर बरसती है।
10मन उस नाम रूपी अमृत का पान करता है।
11अनहद शब्द को सुनकर मन उस बारे चिन्तन करता है। मेरा मन दिन-रात आनंद प्राप्त करता है और भगवान के साथ विलास करता है॥२॥
12मैं भगवान से जन्म-जन्मांतरों का बिछुड़ा हुआ उससे मिल गया हूँ।
13साधु की कृपा से मेरा मुरझाया हुआ मन प्रफुल्लित हो गया है।
14गुरु से सुमति प्राप्त करके नाम-सिमरन करने से मेरा भगवान से मिलाप हो गया है ॥३ ॥
15जिस तरह जल की लहरें जल में मिल जाती हैं,
16इसी तरह मेरी ज्योति परमात्मा की ज्योति में मिल गई है।
17हे नानक ! भगवान ने भ्रम रूपी किवाड़ काट दिए हैं और अब मेरा मन पुनः माया के पीछे नहीं भटकता ॥४॥१६॥२६॥
18माझ महला ५ ॥
19हे ईश्वर ! मैं उस महापुरुष पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने तेरा नाम श्रवण किया है।
20जिसने अपनी जिव्हा से तेरे नाम का उच्चारण किया है, मैं उस महापुरुष पर कुर्बान जाता हूँ।
21हे प्रभु! जो प्राणी मन-तन से तेरी आराधना करता है, मैं सदैव ही तन-मन से उस पर न्यौछावर हूँ॥१॥
22मैं उस व्यक्ति के चरण धोता हूँ जो तेरे मार्ग पर चलता है।
23मैं उस दयालु महापुरुष के नयनों से दर्शन करता हूँ।
24मैं अपना मन अपने उस मित्र को अर्पण करता हूँ, जिसने गुरु से मिलकर उस प्रभु को ढूंढ लिया है॥२॥
25हे भगवान ! वे मनुष्य बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्होंने तुझे समझ लिया है।
26वे पुरुष सबके मध्य निर्लिप्त और निर्विकार हैं।
27संतों की संगति करके वे भवसागर से पार हो जाते हैं और काम आदि सकल दूत वश में कर लिए हैं।॥३॥
28मेरा मन उनकी शरण में आ गया है,
29और अहंकार, बल एवं अँधेरा पैदा करने वाले मोह को त्याग दिया है ।
30हे प्रभु! नानक को अगम्य, अगोचर परमात्मा के नाम का दान प्रदान कीजिए॥४॥२० ॥२७ ॥
31माझ महला ५ ॥
32हे पूज्य परमेश्वर ! तू एक पेड़ है और यह सृष्टि तेरी प्रफुल्लित हुई शाखा है।
33तू सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप में बदल गया है।
34तू जल का सागर है और तू ही इसकी झाग से पैदा हुआ बुलबुला है। तेरे अलावा जगत् में मुझे अन्य कोई दिखाई नहीं देता॥१॥
35हे ईश्वर ! देहि रूपी माला के लिए तुम ही प्राण रूपी सूत हो।
36उस माला की गांठ भी तुम हो और सब मनकों के ऊपर मेरु मनका भी तुम ही हो।
37जगत् के आदि, मध्य और अंत में वही परमेश्वर है, तुझ से अलग कोई दृष्टिगोचर नहीं होता ॥२॥
38हे सुखदाता परमेश्वर ! तू ही निर्गुण एवं तू ही सगुण है।
39तू स्वयं ही निर्लेप, आनंदकारी और समस्त रंगों में अनुरक्त है।
40हे प्रभु ! अपनी कला में तुम स्वयं ही दक्ष हो और तुम स्वयं ही अपना सिमरन करते हो। ॥२१॥
41तुम ठाकुर हो और फिर तुम स्वयं ही सेवक।
42हे पारब्रह्म ! तू स्वयं ही गुप्त भी है और तू ही प्रगट भी है।
43सेवक नानक सदैव ही प्रभु का यशोगान करता है। कृपया, बस एक पल के लिए, उसे अपनी दया दृष्टि से देख आशीर्वाद दें ॥४ ॥२१॥२८ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं