सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1029 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1हे प्रभु ! कृपा करके तूने उसका संसार-सागर से उद्धार कर दिया है।

2यह संसार-सागर तृष्णा की अग्नि के जल से भरा हुआ है, जो बहुत ही गहरा है, परन्तु गुरु इस में से पार उतार देता है॥ २॥

3अंधे को इस बात की सूझ ही नहीं है।

4इसलिए वह जगत् में आता-जाता, मरता और मरकर यहाँ से चला जाता है।

5पूर्व कर्मों द्वारा लिखा भाग्यलेख कभी मिटता नहीं और मनमुखी यम के दर पर दुखी होता है॥ ३॥

6कई जीव जन्मते-मरते रहते हैं और सच्चे घर में निवास प्राप्त नहीं करते और

7कर्म बंधन में फँसकर पाप करते रहते हैं।

8ऐसे ज्ञानहीन को कोई सूझ-बूझ ही नहीं है कि लोभ एवं अहंकार बहुत बुरा है॥ ४॥

9पति-प्रभु के बिना उस जीव स्त्री का श्रृंगार व्यर्थ है

10वह पराए पुरुष के प्रेम में आसक्त रहकर अपने मालिक को भुला देती है।

11जैसे वेश्या के पुत्र का पिता किंसे कहा जा सकता है ? यों ही मनमुख के किए हुए सभी कर्म व्यर्थ एवं विकार रूप हैं।॥ ५॥

12मनमुख प्रेत के शरीर रूपी पिंजरे में अनेक दुख भरे हुए हैं।

13वह अज्ञान रूपी अंधेरे के कारण नरक में दुखी होता है।

14जिसने परमात्मा का नाम भुला है, उसे यमराज का दण्ड भोगना पड़ता है॥ ६॥

15नरक-कुण्ड में सूर्य प्रचंड तपता रहता है और उस में से अग्नि की विध रूपी लपटें निकलती रहती हैं।

16मन के संकेतों पर चलने वाला प्राणी बेशर्म, पशु एवं प्रेत समान है।

17वह आशा एवं अभिलाषा की पूर्ति के लिए झुठ का ही उपयोग करता है और उसे बुराई करने का बुरा रोग लगा रहता है॥ ७॥

18जिस ने अपने माथे एवं सिर पर पाप रूपी मिट्टी का भार उठाया है,

19वह भवसागर से क्योंकर पार हो सकता है ?

20सृष्टि के आदि एवं युगादि से सतिगुरु ही जहाज है, जो राम-नाम द्वारा पार करवा देता है॥ ८॥

21जग में प्रत्येक मनुष्य को पुत्र एवं पत्नी ही प्रिय है और

22सर्वत्र मोह-माया का ही प्रसार फैला हुआ है।

23जो गुरु के सान्निध्य में परम-तत्व का चिंतन करता है, सतगुरु उसके यम के बन्धन तोड़ देता है॥ ९॥

24झूठ की ठगी हुई दुनिया अनेक मार्गों पर चलती है और

25मनमुख तृष्णाग्नि में पड़-पड़कर जलता रहता है।

26गुरु नामामृत देने वाला बड़ा दानवीर है; परमात्मा का नाम जपते रहो, यही सच्चा सुख देने वाला है॥ १०॥

27सतगुरु प्रसन्न होकर सत्य का रहस्य दृढ़ करवाता है;

28वह सभी दुख मिटाकर सन्मार्ग लगाता है।

29जिसका सतगुरु रखवाला बन जाता है, उसके पैर में कॉटा बिल्कुल ही नहीं चुभता॥ ११॥

30जब मनुष्य का शरीर क्षीण हो जाता है तो यह खाक बनकर खाक में ही मिल जाता है।

31मनमुखी जीव पत्थर समान है, जिसका मन भक्ति में नहीं भीगता।

32वह अनेक प्रलाप करता है किन्तु फिर भी कभी नरक और कभी स्वर्ग में जन्म लेता रहता है॥ १२॥

33विष रूप माया नागिन जीवों के संग ही रहती है और

34इस दुविधा ने अनेक घर बर्बाद कर दिए हैं।

35सच्चे गुरु के बिना मन में प्रीति उत्पन्न नहीं होती और भक्ति में लीन रहने वाले संतुष्ट रहते हैं। १३॥

36शक्ति का पुजारी माया के लिए तो बहुत भागदौड़ करता है किन्तु

37नाम को भुलाकर कैसे सुख प्राप्त कर सकता है।

38वह त्रिगुणात्मक माया में ही खपता खपाता रहता है, अतः उसकी मुक्ति नहीं होती॥ १४॥

39झूठे आदमी को कुत्ता एवं सूअर ही कहा जाता है,

40वह कुते की तरह व्यर्थ भौंकता रहता है और भौंक-भौंक कर हार जाता है।

41वह मन-तन से झूठा है, झूठे काम करता है और दुर्मति के कारण अपनी जीवन बाजी हार कर ही प्रभु-दरबार में जाता है॥ १५॥

42यदि सतगुरु मिल जाए तो मन स्थिर हो जाता है और शरण में आए हुए को राम-नाम प्रदान कर देता है।

43वह अमूल्य हरि-नाम रूपी धन प्रदान करता है।

44जो हरि का यशगान करता है वही दरबार में प्रभु को प्यारा लगता है॥ १६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं