सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1028 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1सतिगुरु ही दाता है, वही जीव की मुक्ति करवाता है।

2वह मुँह में नामामृत डाल कर सभी रोग दूर कर देता है।

3जिसकी तृष्णाग्नि बुझ गई है, सीना शीतल हो गया है, यम रूपी अधिकारी उस पर कोई कर (टैक्स) नहीं लगाता॥ ५॥

4आत्मा रूपी हंस काया से बहुत प्रेम लगा लेता है।

5आत्मा एक योगी पुरुष के समान है और यह काया एक सुन्दर नारी की तरह है।

6आत्मा रूपी योग्री काया रूपी नारी को दिन-रात भोगता रहता है, उससे बड़ा आनंद-विनोद करता है किन्तु संसार से जाते वक्त उससे कोई सलाह-मशविरा नहीं करता॥ ६॥

7सृष्टि को पैदा करके प्रभु इसमें व्याप्त हो रहा है और

8वह पवन, पानी एवं अग्नि के रूप में प्रगट हो रहा है।

9परन्तु कामादिक दूतों की संगत में मिलकर मनुष्य का मन डगमगाता रहता है और अपने किए कमों का ही फल प्राप्त करता है॥ ७॥

10वह परमात्मा के नाम को भुलाकर किए दोष के दुख सहन करता रहता है।

11जब ईश्वर का हुक्म हो गया तो फिर जीव यहाँ चलने से कैसे रह सकता है।

12जैसे जल से विहीन मछली तड़पती है, वैसे ही जीव यमपुरी में जाकर नरक-कुण्ड में गोते खाता है॥ ८॥

13शाक्त मनुष्य चौरासी लाख योनि-चक्र का नरक भोगता है।

14वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।

15गुरु के बिना उसकी मुक्ति नहीं होती, कमों में बँधा होने के कारण यम उसे जकड़ लेता है॥ ९॥

16यम के मार्ग में उसे ऐसी गली में से गुजरना पड़ता है जो तलवार की धार की तरह बहुत ही तंग एवं संकुचित है।

17जैसे तिलों को कोल्हू में पिराया जाता है, वैसे ही कर्मों का हिसाब लिया जाता है।

18वहाँ माता-पिता, पत्नी-पुत्र, मित्र कोई भी साथ नहीं होता, हरि-नाम रूपी रस का पान किए बिना मुक्ति नहीं मिलती॥ १०॥

19जग में चाहे कितने ही एवं साथी हों लेकिन

20गुरु-परमेश्वर के बिना अंतकाल कोई भी मददगार नहीं होता।

21गुरु की सेवा ही मुक्ति का साधन है और साथ ही जिसने रात-दिन परमात्मा का संकीर्तन किया है॥ ११॥

22झूठ को छोड़कर सत्य को पाने का प्रयास करो और

23इस प्रकार मनवांछित फल पा लो।

24जग में सत्य-नाम रूपी सौदे के व्यापारी विरले ही हैं, जिन्होंने नाम रूपी मुनाफा प्राप्त करके यह सौदा किया है॥ १२॥

25हरि-नाम रूपी सौदा साथ लेकर जाओ और

26सहज ही सत्य के धाम पर पहुँचकर ईश्वर के दर्शन हासिल कर लो।

27गुरमुख पूर्ण पुरुषों ने परम-सत्य को खोज लिया है और उस निरंकार को समदर्शी के रूप में पहचान लिया है॥ १३॥

28कोई विरला ही गुरु मतानुसार बेअन्त प्रभु को प्राप्त करता है,

29वह गुरु के शब्द द्वारा मन को समझाता है।

30सतगुरु की वाणी को सत्य मानो, इस प्रकार ईश्वर में लीन हुआ जा सकता है॥ १४॥

31हे ईश्वर ! देवर्षि नारद एवं विद्या की देवी सरस्वती तेरे ही उपासक हैं,

32आकाश, पाताल एवं पृथ्वी इन तीनों लोकों में बड़े-बड़े संत महात्मा, देवी-देवता इत्यादि तेरी उपासना में लीन हैं।

33यह सारी कुदरत तेरी ही रचना है, तू सबका दाता है और सब तेरी मर्जी से हो रहा है॥ १५॥

34कई जीव तेरे दर पर तेरी स्तुति करते हुए अपना दुख-दर्द दूर कर रहे हैं।

35सतगुरु उन्हें बन्धनों से मुक्त करवाता है और वे सत्य के दरबार में सत्कृत होते हैं।

36सतगुरु उनके अहम् के बन्धनों को तोड़ देता है और उनका चंचल मन इधर-उधर नहीं भटकता॥ १६॥

37सतगुरु से मिलो और उससे ऐसी विधि पहचान लो,

38जिससे प्रभु प्राप्त हो जाए और कमों का हिसाब-किताब मिट जाए।

39अपने अहम् को मिटाकर गुरु की सेवा करो; नानक तो परमात्मा के प्रेम-रंग में भीग गया है॥ १७॥ २॥ ८॥

40मारू महला १॥

41ईश्वर पाप रूपी असुरों का संहार करने वाला है;

42वह प्यारा प्रभु सब जीवों में समाया हुआ है।

43वह अदृष्ट रूप में साथ ही है, मगर उसके दर्शन एवं सूझ बिल्कुल नहीं होती और गुरु के सान्निध्य में चिंतन से ही प्राप्ति होती है॥ १॥

44जो साधु गुरुमुख तेरी शरण में आया है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं