गुरु ग्रंथ साहिब 1026 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1पराई-निन्दा और दूसरों से द्वेष करना छोड़ दो,
2जो ग्रंथों का अध्ययन करके भी इर्षा-अग्नि में जलते रहते हैं, उनके मन को शान्ति नहीं मिलती।
3सत्संगति में मिलकर राम-नाम का स्तुतिगान करो, अंत में वही सहायक होता है॥ ७॥
4काम, क्रोध एवं बुराई करना छोड़ दो,
5अहम् पैदा करने वाला धंधा एवं लम्पटता छोड़ दो ।
6गुरु की शरण में रहे तो बन्धनों से मुक्त हो जाओगे, इस तरह भवसागर पार किया जा सकता है।८॥
7आगे यमपुरी में विशुद्ध अग्नि से भरी हुई वैतर्णी नामक नदी में से पार होना पड़ता है, जिसमें से विष रूपी लपटें निकलती हैं।
8वहाँ जीव अकेला ही होता है और उसका कोई साथीं नहीं होता।
9उस अग्नि के सागर में भड़कती हुई लहरें उत्पन्न होती हैं, जिन में गिरकर स्वेच्छाचारी जलकर राख हो जाते हैं।॥ ९॥
10मुक्ति का भेद गुरु के ही पास है, जो वह स्वेच्छा से ही देता है।
11जिन्होंने गुरु से मुक्ति का भेद पाया है, वही इसकी विधि को जानते हैं।
12हे भाई ! उनसे जाकर पूछ लो, जिन्होंने इसे पा लिया है। सतिगुरु की सेवा करने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है। १०॥
13गुरु के बिना जीव विकारों में उलझकर मर जाते हैं।
14फिर यम उनके सिर पर प्रहार करके बड़ा तंग करता है।
15बन्धनों में फेंसे हुए निंदक आदमी की मुक्ति संभव नहीं, वह पराई निन्दा कर-कर के ही डूब जाता है॥ ११॥
16सदैव सत्य बोलो और मन में ही पहचान लो,
17अपने मन में ही झाँक कर देखो, वह कहीं दूर नहीं है।
18गुरुमुख नाम रूपी नैया में सवार होकर भवसागर में से पार हो जाता है और उसे कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता॥ १२॥
19शरीर में ही प्रभु-नाम स्थित है,
20वह अविनाशी परमात्मा स्वयं ही रचयिता है।
21आत्मा न कभी मरता है, न ही इसे मारा जा सकता है, ईश्वर स्वयं ही रचना करके अपनी इच्छानुसार देख-रेख करता है॥ १३॥
22परमात्मा निर्मल है, उसमें अज्ञान रूपी अंधेरा नहीं है।
23वह परम-सत्य स्वयं ही अपने सिंहासन पर विराजमान होता है।
24प्रभु से टूटे हुए झूठे जीव बन्धनों में फँसकर योनि-चक्र में ही भटकते रहते हैं, इसलिए पुनः पुनः जन्म-मरण में ही पड़े रहते हैं। १४॥
25गुरु की सेवा में लल्लीन रहने वाले सेवक सतगुरु को बहुत प्रिय हैं।
26वे सत्य के सिंहासन पर विराजमान होकर ब्रह्म-शब्द का ही चिन्तन करते हैं।
27वे परम तत्व को पाकर अन्तर्गति को जान लेते हैं और सत्संगत में मिलकर सत्य का स्तुतिगान करके बड़ाई प्राप्त करते हैं।॥ १५॥
28ऐसे भक्तजन स्वयं तो पार होते ही हैं, अपने पेितरों का भी उद्धार करने के योगदान देते हैं।
29उनकी संगत में आने वाले भी मुक्ति पा कर उद्धारक बन गए हैं।
30नानक उसका सेवक एवं गुलाम है, जिस गुरमुख ने परमात्मा में लगन लगाई है॥ १६॥ ६॥
31मारू महला १॥
32प्रलय के घोर अन्धेरे में कितने ही युग बीत गए
33जब अपरंपार ईश्वर ने समाधि लगाई थी
34उस घोर अन्धकार में निर्लिप्त होकर वह अकेला ही बैठा रहा, तब कोई जगत्-प्रसार नहीं था और न ही कोई कामकाज था॥ १॥
35उसने छत्तीस युगों का प्रचलन किया,
36जैसे उसे मंजूर है, वैसे चलाता है।
37उसका शरीक कोई दिखाई नहीं देता, वह स्वयं अपरंपार है॥ २॥
38यह बात समझ लो कि वह चारों युगों में गुप्त रूप में क्रियाशील है,
39प्रत्येक जीव के हृदय एवं उदर में व्याप्त है।
40सच तो यही है केि युग-युगांतर केवल ईश्वर ही कार्यशील है, लेकिन इस तथ्य को कोई विरला ही गुरु के विचार द्वारा बूझता है॥ ३॥
41जब माँ के रक्त एवं पिता के वीर्य से मिलकर मानव-शरीर का सृजन हुआ तो
42पवन, पानी एवं अग्नि इत्यादि पंच तत्वों ने मिलकर प्राणों का संचार करके बना दिया।
43इस शरीर रूपी रंग-महल में ईश्वर स्वयं ही लीला करता है, अन्य मोह-माया का ही प्रसार है॥ ४॥
44माँ के गर्भ में उल्टा पड़ा हुआ जीव परमात्मा के ध्यान में लीन था।
45अन्तर्यामी स्वयं लीला जानता है,
46माँ के उदर में जीव श्वास-श्वास से सत्य-नाम को ही स्मरण कर रहा था॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं