सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1025 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1ईश्वर को विस्मृत करने वाली जीव-स्त्री बहुत कष्ट सहन करती है और

2अनेक चतुराईयाँ करने से भी उसका भ्रम दूर नहीं होता।

3मूर्ख व्यक्ति परमात्मा को याद नहीं करते, अतः दुखी ही हुए हैं और उन्होंने पापों का भार लाद लिया है॥ ८॥

4वैर-विरोध से कोई खाली नहीं है,

5अगर कोई इससे बचा हुआ है तो मुझे दिखा दो, मैं उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करूँगा।

6मन-तन अर्पण करने से ही परमात्मा मिलता है, भगवान से प्रीति बनी रहती है॥ ९॥

7प्रभु की गति एवं महिमा कोई भी जान नहीं सकता।

8अगर कोई कहता है कि मैं ही बड़ा हूँ तो उसका आत्माभिमान उसे मिटा देता है।

9सच्चे परमेश्वर की देन में कोई कमी नहीं, सारी दुनिया उसने ही पैदा की है॥ १०॥

10उस बेपरवाह की महिमा बहुत बड़ी है,

11वह स्वयं ही जीवों को पैदा करके उन्हें लिए भोजन देता है।

12वह दयालु दाता कहीं दूर नहीं है और वह सहज ही अपनी मर्जी से है॥ ११॥

13दुनिया में कोई शोकग्रस्त है तो कोई रोगग्रस्त है।

14जो कुछ करता है, वह स्वेच्छा से ही करता है।

15यदि गुरु की शिक्षा द्वारा भगवान की भक्ति की जाए तो अनाहत शब्द का अनुभव हो जाता है॥ १२॥

16कुछ नंगे-भूखे इधर-उधर भटकते रहते हैं,

17कुछ हठपूकि प्राण त्याग देते हैं और अमूल्य जन्म का महत्व नहीं समझते।

18वे भले बुरे का महत्व नहीं जानते, परन्तु जो शब्द की साधना करते हैं, वही इस रहस्य को बूझते हैं।॥ १३॥

19कोई तीथों में स्नान करता है तो कोई व्रत उपवास रखता है,

20कुछ लोग धूनियाँ तपाकर शरीर को कष्ट देते हैं।

21राम नाम के बिना किसी की भी मुक्ति संभव नहीं, तो फिर किस विधि द्वारा पार हुआ जा सकता है॥ १४॥

22कुछ व्यक्ति गुरुमत को छोड़कर पथभ्रष्ट हो जाते हैं।

23स्वेच्छाचारी जीव राम नाम का जाप नहीं करता,

24झूठ कमाता है, दुखी होकर डूबता है और झूठ के कारण यम भी उसका वैरी हो जाता है।॥ १५॥

25हुक्म से ही जीव का जन्म-मरण होता है

26जो हुक्म के रहस्य को जान लेता है, वह सत्य में विलीन हो जाता है।

27हे नानक ! सत्यस्वरूप परमात्मा उसे ही मिलता है, जिसे मन में प्यारा लगता है और गुरुमुख बनकर नाम-सिमरन का कर्म करता है॥ १६॥ ५॥

28मारू महला १॥

29परमात्मा स्वयं संसार का रचयिता पुरुष विधाता है,

30जिसने स्वयं जीवों को पैदा करके पहचान दी है।

31सतगुरु एवं सेवक भी वही है और उसने स्वयं ही सृष्टि उत्पन्न की है॥ १॥

32वह हमारे निकट ही है, कहीं दूर नहीं।

33जिन्होंने गुरु के सान्निध्य में रहकर इस रहस्य को बूझ लिया है, वही पूर्ण पुरुष हैं।

34गुरु-संगति की यही कीर्ति है कि उनकी संगति में रहने से नित्य लाभ ही लाभ मिलता है॥ २॥

35हे प्यारे प्रभु ! तेरे संतजन युग-युग भले हैं,

36जो प्रेमपूर्वक तेरे गुण गाते रहते हैं।

37वे तेरा स्तुतिगान करके दुख-दारिद्रय से मुक्त हो जाते हैं और उन्हें कोई पराई चिंता नहीं है॥ ३॥

38वे सदा मोह-माया से सतर्क रहते हैं और मोह की निद्रा में दिखाई नहीं देते।

39वे सत्य-नाम ही वितरित करते हैं और अपने संगियों एवं वंशावलि का उद्धार कर देते हैं।

40वे सदैव निर्मल हैं, उन्हें पापों की मैल स्पर्श नहीं करती और उनकी प्रभु-भक्ति में ही लगन लगी रहती है।॥ ४॥

41हे भक्तजनो ! सतगुरु की वाणी को समझो,

42यह यौवन, श्वास एवं शरीर पुराना हो जाना है अर्थात् नाशवान है।

43आज अथवा कल एक न एक दिन प्राणी ने मृत्यु को प्राप्त हो जाना है, इसलिए भगवान का जाप कर लो और हृदय में उसका ही ध्यान करो॥ ५॥

44हे प्राणी ! झूठी बातों को छोड़ दो, झूठे आदमी को काल पछाड़ कर मारता है।

45ईश्वर से विमुख जीव झूठ में फँसकर नष्ट हो जाता है।

46उसके मन में अहम् ही बना रहता है और दैतभाव के मार्ग पर चलकर वह समाप्त हो जाता है॥ ६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं