सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1024 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1कोई विरला गुरुमुख ही रहस्य को पहचानता था।

2पृथ्वी को धारण कृरने वाला अब धर्म रूपी बैल दो पैरों पर खड़ा था और गुरु से ही सत्य की प्राप्ति होती थी।८ ।

3बड़े-बड़े राजा अपने किसी मनोरथ के लिए धर्म-कर्म कर रहे थे,

4वे किसी आशा में बँधकर दान-पुण्य करते थे।

5वे अनेक धर्म-कर्म करके थक गए लेकिन राम-नाम के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती॥ ६॥

6लोग धर्म-कर्म करके मुक्ति की कामना कर रहे थे

7किन्तु ब्रह्म-शब्द की स्तुति से ही मुक्ति मिलती है।

8लोग दुनिया के परपंच में अकारथ ही भटक रहे थे, पर शब्द गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिलती॥ १०॥

9जीवों से माया ममता छोड़ी नहीं जाती थी,

10लेकिन जिन्होंने सत्य की साधना की, वे बन्धनों से छूट गए।

11महापुरुष रात-दिन भगवान की भक्ति में लीन थे और उनकी ठाकुर जी से अटूट प्रीति बनी हुई थी॥ ११॥

12कोई मंत्रों के जप व तपस्या में लीन थे तो कोई तीर्थों में स्नान कर रहे थे।

13हे परमात्मा ! जैसा तुझे मंजूर है, तू वैसे ही जीवों को चलाता है।

14हठ-योग व इन्द्रियों को संयमित करने से मन आनंदित नहीं होता। गुरु (के ज्ञान) परमेश्वर (की स्तुति) के बिना किसी को भी सत्य के दरबार में यश नहीं मिला।॥ १२॥

15कलयुग में धर्म (रूपी बैल) की एक ही कला रह गई,

16पूर्ण गुरु के बिना किसी ने भी सत्य की बात नहीं की है।

17मनमुखी जीवों का यही आचरण है की उनमे झूठ का विचरण ही रहा है पर सतगुरु के बिना भ्रम दूर नहीं होता॥ १३॥

18सतगुरु परमेश्वर बे-परवाह एवं स्रष्टा है

19न उसे कोई यम का भय है और न ही लोगों पर निर्भर है,

20जो उसकी भक्ति करता है, वह काल भी दुखी नहीं करता॥ १४॥

21परमेश्वर ने खुद को गुरु के हृदय में प्रगट किया हुआ है

22गुरु के नाम-मंत्र से करोड़ों असंख्य जीवों का उद्धार हुआ है।

23जग का जीवन परमेश्वर सब जीवों को देने वाला है, वह निर्भय एवं पवित्र-पावन है॥ १५॥

24सब जीव गुरु भण्डारी से ही माँगते हैं,

25वह स्वयं मायातीत, अलक्ष्य व अपरंपार है।

26नानक सत्य कहता है और प्रभु से यही माँगता है कि मुझे अपनी रज़ा में रखकर सत्य का दान दीजिए॥ १६॥ ४॥

27मारू महला १॥

28परमात्मा ने शब्द गुरु द्वारा ही अपने संग मिलाया है,

29जब उसे मंजूर हुआ तो वे सहज स्वभाव सत्य में समा गए।

30तीनों लोकों में परमेश्वर ने अपनी ज्योति स्थापित की हुई है, उस जैसा बड़ा अन्य कोई नहीं है। १॥

31जिसके हम सेवक हैं, उसकी ही भक्ति में लीन रहते हैं।

32वह अलख अभेद्य शब्द की स्तुति से ही प्रसन्न होता है।

33वह भक्तजनों का कल्याण करने वाला है, यह उसका बड़प्पन है कि शरण में आए जीवों को क्षमा कर देता है॥ २॥

34जीवों को देते देते उस सच्चे के घर में कोई कमी नहीं आती,

35परन्तु झुठे एहसान-फरामोश ले लेकर भी मुकर जाते हैं।

36वे अपने मूल को पहचानते नहीं, सत्य में उनकी कोई लगन नहीं लगती, इसलिए दैतभाव व भ्रम के कारण भटकते रहते हैं।॥ ३॥

37गुरुमुख दिन-रात माया की ओर से जाग्रत रहते हैं,

38वे गुरु-मतानुसार सत्य में ध्यान लगाने की विधि को समझ लेते हैं।

39मगर मनमुख जीव अज्ञान की निद्रा में पड़े रहते हैं, इसलिए कामादिक विकार उनके शुभ गुणों को लूट लेते हैं। गुरुमुख अपने गुणों की पूँजी को बचाकर रखते हैं।॥ ४॥

40झूठे व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं।

41वे झूठ में रत रहकर झूठे काम ही करते रहते हैं।

42जो शब्द की स्तुति में लीन रहते हैं, उन्हें ही सच्चे दरबार में शोभा हासिल होती है और गुरु के माध्यम से उनका सत्य में ही ध्यान लगा रहता है।॥ ५॥

43झूठ में रत जीव रूपी नारी की जीवन-रूपी वाटिका को कामादिक ठगों ने ऐसे उजाड़ दिया है,

44जैसे उजाड़ में लगी हुई वाटिका को पशु उजाड़ देते हैं।

45हरि-नाम के बिना जीवन में कुछ स्वादिष्ट नहीं लगता, भगवान को भूलने से दुख ही प्राप्त होता है। ६॥

46यदि सत्य-नाम रूपी भोजन मिल जाए तो मन तृप्त हो जाता है।

47जिसे अमूल्य नाम-रत्न मिल जाता है, उसे ही यश प्राप्त होता है।

48जो आत्म-स्वरूप को पहचान लेता है, उसे सत्य की पहचान हो जाती है और फिर उसकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं