गुरु ग्रंथ साहिब 1023 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1उस परमसत्य से ऊँचा कोई नजर नहीं आता, उसने स्वयं ही सत्य की महिमा को जाना है॥ ८॥
2यहाँ जीव चार दिन ही आता है,
3यह जग खेल-तमाशा है और जीव अज्ञानता के घोर अँधेरे में रहता है।
4जैसे कोई सपने में बड़बड़ाता है, वैसे ही जीव रूपी बाजीगर अपनी जीवन-बाजी खेलकर चले गए हैं॥ ६॥
5उन्हें ही सत्य के सिंहासन पर बड़ाई मिली है
6जिन्होंने परमात्मा को मन में बसाया है, उसमें लगन लगाई है, ।
7खण्ड-ब्रह्माण्ड, पाताल, चौदह पुरियों एवं तीनों लोकों में रहने वाले जीवों ने सत्य में ही समाधि लगाई है॥ १०॥
8निरंकार की सचखण्ड रूपी नगरी सत्य है, उसका सिंहासन सदा अटल है।
9जो गुरुमुख सत्य को पा लेता है, उसे सुख हासिल हो जाता है।
10जिसे सत्य के सिंहासन पर बड़ाई मिली है, उसने अभिमान को मिटा दिया है॥ ११॥
11गणना करने वाला संशय में ही जीता रहता है,
12द्वैतभाव व भ्रम में सुख कैसे प्राप्त हो सकता है।
13देने वाला मायातीत एक परमात्मा ही निर्मल है और पूर्ण गुरु की सेवा से ही शोमा हासिल होती है॥ १२॥
14युग-युगान्तर किसी विरले गुरुमुख ने ही सत्य का रहस्य जाना है और
15यह मन भी उस परम-सत्य में लीन है।
16उसकी ओट लेकर सुख हासिल हो गया है, अब मन-तन शुद्ध हो गया है॥ १३॥
17यह जीभ सत्य के रस में ही लीन रहती है।
18यदि प्रभु साथी है तो कोई भय एवं अहं नहीं।
19गुरु की वाणी सुनकर कान तृप्त हो गए हैं और यह ज्योति-परमज्योति में विलीन हो गई है॥ १४॥
20मैं सोच-समझकर पैर धरती पर रखकर चलता हूँ।
21हे ईश्वर ! जहाँ कहीं तेरी ही शरण चाहता हूँ।
22चाहे तू दुख अथवा सुख दे, तू ही मन को प्यारा लगता है और मेरी तुझ से ही प्रीति बनी हुई है॥ १५॥
23अन्तिम समय कोई किसी का साथी नहीं और
24गुरु के माध्यम से इस सत्य को समझकर तेरी ही प्रशंसा करता हूँ।
25हे नानक ! सत्य-नाम में लीन रहने वाले ही वास्तव में वैरागी हैं और उन्होंने सच्चे घर में ही समाधि लगाई हुई है॥ १६॥ ३॥
26मारू महला १॥
27जग के प्रारम्भ व युगों-युगान्तरों से अपरंपार ईश्वर ही व्याप्त है।
28मायातीत है, सृष्टि का आदि है और वही हमारा मालिक है।
29उस परम-सत्य ने योग-युक्ति का विचार किया और निर्गुण रूप में समाधि लगा ली॥ १॥
30सृष्टि-रचना से पूर्व कितने ही युग घोर अंधकार बना रहा
31सृष्टा ने तब समाधि लगाई थी
32उसका नाम सदैव सत्य है, उसकी बड़ाई सदा शाश्वत है, जिसका कर रहा हूँ, वह सत्य के सिंहासन पर विराजमान है॥ २॥
33जब सत्ययुग आया तो तब लोगों में सत्य एवं संतोष था।
34चारों ओर सत्य का प्रसार था।
35सच्चा परमेश्वर सत्य की ही परख करता है और उसके हुक्म से दुनिया चल रही है॥ ३॥
36पूर्ण सतगुरु संतोषी एवं सत्यनिष्ठ है।
37जो गुरु के शब्द में आस्था रखता है, यही शूरवीर है।
38जो परमात्मा के हुक्म एवं रज़ा को मानता है, उसका सत्य के दरबार में निवास होता है॥ ४॥
39सत्ययुग में प्रत्येक आदमी सत्य बोलता था और
40जो सत्य में विचरण करता था, वही सत्यवादी था।
41मन एवं मुख में सत्य के कारण भ्रम-भय मिट जाता था और गुरु के माध्यम से सत्य ही साथी था॥ ५॥
42त्रैता युग में धर्म (रूपी वैल) की एक कला नाश हो गई,
43धर्म के तीन पैर रह गए और जीवों के मन में दुविधा प्रगट हो गई।
44इस युग में गुरुमुख ही सत्य बोलता था पर स्वेच्छाचारी दुविधा में चिंताग्रस्त रहता था॥ ६॥
45स्वेच्छाचारी प्रभु दरबार में कभी मान्य नहीं होता।
46ब्रह्म-शब्द के बिना उसका अन्तर्मन कैसे संतुष्ट हो सकता है?
47इसलिए स्वेच्छाचारी कर्म-बन्धन के कारण आवागमन में पड़े रहते थे और उन्हें सत्य का ज्ञान नहीं होता था॥ ७॥
48द्वापर युग में दया की भावना आधी हो गई और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं