गुरु ग्रंथ साहिब 1022 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1गंगा, यमुना, वृंदावन, केदारनाथ,
2काशी, मथुरा, द्वारिका पुरी,
3गंगासागर और त्रिवेणी संगम इत्यादि अड़सठ तीर्थ ईश्वर के स्वरूप में ही लीन बने हुए हैं।॥ ६॥
4वह स्वयं ही सिद्ध, साधक एवं विचार करने वाला विद्वान है।
5पंचों की सभा में वह स्वयं ही राजा है।
6प्रभु स्वयं ही न्यायाधीश बनकर सिंहासन पर विराजमान होता है और उसकी कृपा से भ्रम, भेद एवं भय दूर हो जाता है॥ १०॥
7काजी एवं मुल्ला वह स्वयं ही है।
8वह अविस्मरणीय है और कभी भूला नहीं है,
9वह दाता बड़ा मेहरबान एवं दयालु है और उसका किसी से कोई वैर नहीं।॥ ११॥
10जिस पर कृपा करता है, उसे ही यश प्रदान करता है।
11वह सबका दाता है, जिसे तिल भर किसी बात का कोई लोभ नहीं।
12गुप्त एवं प्रगट रूप में सब स्थानों पर वह शुद्ध रूप में सर्वव्यापक हो रहा है। १२॥
13अगम्य, अपार ईश्वर की क्या प्रशंसा करूं,
14परम-सत्य सृजनहार
15जिस पर करुणा-दृष्टि करता है, उसे साथ मिला लेता है, मिलाने वाला यही है॥ १३॥
16ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर भी
17अलख-अपार परमात्मा के द्वार पर खड़े उसकी सेवा में लीन हैं और
18कितनी ही सृष्टि उसके द्वार पर फरियाद कर रही है परन्तु उनकी गणना करना संभव नहीं है॥ १४॥
19उसकी वाणी एवं कीर्ति सदैव सत्य है और
20वेदों-पुराणों में भी सत्य की स्तुति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता।
21परमात्मा का नाम ही मेरी जीवन-पूंजी है, उसका ही गुणगान करता हूँ और उसके अलावा मेरा अन्य कोई अवलम्ब नहीं॥ १५॥
22युगों-युगान्तरों से परम-सत्य परमात्मा ही है, वह वर्तमान में भी है और भविष्य में भी एक वही होगा।
23वह कौन है जो मरा नहीं और कौन है जो मरेगा नहीं।
24गुरु नानक स्वयं को निम्न मानते हुए विनती करते हैं कि भगवान में ध्यान लगाकर उसे हृदय घर में ही देख लो॥ १६॥ २॥
25मारू महला १॥
26द्वैतभाव व दुर्मति के कारण जीव रूपी नारी अन्धी व बहरी हो चुकी है।
27उसने काम-क्रोध की कच्ची चोली धारण की हुई है।
28वह किशोरी इस बात से बेखबर है कि उसका पति-प्रभु हृदय-घर में ही है, अपने स्वामी के बिना उसे रात को नींद भी नहीं आती॥ १॥
29मन में तृष्णाग्नि भड़कती रहती है और
30मनमुख चारों दिशाओं में उम्मीद लगाकर रहता है।
31सतगुरु की सेवा किए बिना सुख कैसे प्राप्त हो सकता है, यह बड़ाई तो सच्चे परमेश्वर के हाथ में है॥ २॥
32जो काम, क्रोध एवं अहंकार का निवारण करता है,
33शब्द द्वारा कामादिक पाँच चोरों को मारता है और
34ज्ञान रूपी खड्ग लेकर मन से जूझता है, उसकी तमाम लालसा मन में ही समा जाती है।॥ ३॥
35माँ के रक्त एवं पिता के वीर्य से तूने
36मानव-शरीर रूपी सुन्दर मूर्ति का निर्माण किया।
37सब में तेरी प्राण-ज्योति विद्यमान है, तू बनानेवाला है, सर्वव्यापक है॥ ४॥
38जीवन-मृत्यु तूने ही बनाया है,
39गुरु से इस रहस्य का ज्ञान हो गया है, इसलिए अब मृत्यु से क्या डरना।
40तू बड़ा दयालु है, जिसे दया-दृष्टि से देखता है, उसके शरीर से दुख-दर्द मिट जाता है।॥ ५॥
41जो सच्चे घर में निवास कर लेते हैं, उन्होंने मृत्यु के भय को निगल लिया है।
42उन्होंने भटकते मन पर अंकुश लगा लिया है और उनका हृदय-कमल खिल गया है।
43उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ रूपी सरोवर नाभामृत के जल से भरपूर हो गया है और राम ही उनका मित्र बन गया है॥ ६॥
44सब जीव मृत्यु की तिथि लिखवाकर पृथ्वी में आते हैं,
45जब मृत्यु अटल है तो कोई कैसे सदा के लिए रह सकता है। उन्होंने पुनः परलोक गमन ही करना है।
46ईश्वर का हुक्म अटल है, जो उसके हुक्म का पालन करते हैं, वे सचखंड में पहुँच जाते हैं और सत्य से ही उन्हें बड़ाई मिलती है।॥ ७॥
47समूचा जगत् ईश्वर ने स्वयं ही उत्पन्न किया है।
48जिसने यह जगत्-प्रसार किया है, उसने स्वयं जीवों को भिन्न भिन्न कार्यों में लगा दिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं