सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1021 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1वह स्वयं ही किसी के कर्म पर क्षमा-दान करता है और किसी को दण्ड देता है॥ ८॥

2वह स्वयं ही धनुष एवं बाण चलाने वाला है,

3वह बड़ा बुद्धिमान, सुन्दर रूप एवं चतुर है।

4वह स्वयं ही कहने वाला, वक्ता एवं श्रोता है और सब उसकी ही रचना है॥ ९॥

5पवन जगत् का गुरु है, पानी पिता है और

6उदर के संयोग से धरती जगत् की माता है।

7रात और दिन दोनों दाई-दाया हैं और समूचा जगत् इनके खेलाने से खेल रहा है॥ १०॥

8मछली एवं फॉसने वाला जाल परमात्मा ही है।

9वह स्वयं ही गाय और स्वयं ही रखवाला है।

10हे ईश्वर ! सब जीवों में तेरी ही ज्योति है, जैसी तेरी आज्ञा है, दुनिया वैसे ही चल रही है॥ ११॥

11योगी, भोगी,

12रसिया एवं परम संयोगी भी वही है और

13निराकार निर्भय परमात्मा ने स्वयं ही समाधि लगाई हुई है॥ १२॥

14हे सर्वेश्वर ! अण्डज, जेरज, स्वेदज, उद्भज्ज चारों स्रोत एवं चारों वाणियां तुझ में ही समाई हुई है।

15जो भी दृष्टिमान है, सब नाशवान् है।

16जिन्हें सतगुरु ने ज्ञान प्रदान किया है, वही सत्य के व्यापारी एवं साहूकार हैं॥ १३॥

17पूर्ण सतगुरु ही शब्द का रहस्य बतलाता है कि

18ईश्वर सर्वकला सम्पूर्ण है।

19हे ईश्वर ! तू बेपरवाह एवं मन-वाणी से परे है और तुझे तिल मात्र भी कोई लालच नहीं॥ १४॥

20उसे देखकर भयानक काल भी भाग जाता है

21जो व्यक्ति मन में सहज ही शब्द का रस प्राप्त करता है।

22जिसके मन को भगवान की भक्ति भा गई है, वरदाता परमेश्वर ने प्रसन्न होकर मुक्ति-तृप्ति प्रदान की है॥ १५॥

23हे परमात्मा ! तू स्वयं ही निर्लिप्त रहता है, पर तेरा ज्ञान गुरु की संगत करने से ही होता है।

24जो कुछ भी दिखाई देता है, वह तुझ में ही विलीन हो जाता है।

25नानक स्वयं को निम्न मानते हुए सत्य के द्वार पर भिक्षा मॉगते हैं कि उसे नाम-दान की बड़ाई दीजिए॥ १६॥ १॥

26मारू महला १॥

27धरती, धर्म रूपी बैल एवं आकाश स्वयं ईश्वर ही है,

28उस परम-सत्य ने स्वयं ही अपने गुणों का प्रकाश किया है।

29ब्रहाचारी, सदाचारी, संतोषी भी वही है एवं स्वयं ही कार्य कर रहा है॥ १॥

30जिसने यह जगत् बनाया है, वही उसकी देखभाल करता है।

31उस परम-सत्य द्वारा लिखे कर्मालेख को कोई नहीं मिटा सकता,

32वही करता एवं जीवों से करवाता है और स्वयं ही भक्तजनों को बड़ाई देता है॥ २॥

33काम-क्रोध रूपी पाँच चोर आदमी के चंचल मन को चलायमान कर देते हैं।

34वह पराई नारी की ओर देखता रहता है किन्तु अपने घर की तलाश नहीं करता।

35मानव-शरीर रूपी नगरी का अन्त हो जाता है और शब्द-गुरु के बिना जीव अपनी प्रतिष्ठा गंवा देता है॥ ३॥

36जो गुरु द्वारा सत्य का रहस्य बूझ लेता है, उसे तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है।

37वह अपनी अभिलाषा को मार कर मन में जूझता रहता है।

38हे ईश्वर ! जो तेरी भक्ति करते हैं, वे तेरा ही रूप बन जाते हैं तू निर्भय एवं बचपन का साथी है॥ ४॥

39स्वर्गलोक, मृत्युलोक एवं पाताल लोक परमसत्य का ही रूप हैं।

40वह स्वयं ही ज्योति स्वरूप एवं तरुण है।

41वह स्वयं ही विकट जटाधारी एवं विकराल स्वरूप वाला है और उसकी कोई रूप-रेखा नहीं है॥ ५॥

42वेदों एवं कुरान ने भी परमात्मा का भेद नहीं समझा और

43उसका कोई माता-पिता, पुत्र एवं भाई नहीं है।

44वह सब पर्वतों को बनाकर खुद में ही विलीन कर लेता है और उस अलख को देखा नहीं जा सकता॥ ६॥

45मैं अनेक मित्र बनाकर थक गया हूँ मगर

46कोई भी मेरे अवगुण काटने वाला नहीं।

47देवताओं, मनुष्यों एवं योगियों सबका मालिक केवल ईश्वर है, वह भक्ति भाव से ही मिलता है और फिर भय दूर हो जाता है।॥ ७॥

48पथभ्रष्ट जीव को स्वयं ही सही रास्ता बताता है।

49वह स्वयं ही भुला देता है और स्वयं ही सत्य का ज्ञान देता है।

50तेरे नाम के बिना मुझे कोई सहारा नजर नहीं आता और तेरी गति एवं मर्यादा नाम द्वारा ही प्राप्त होती है॥ ८॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं