सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1020 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1सृजनहार उन्हें नरक में धकेल देता है और यमराज रूपी बानिया उनसे कर्मो का हिसाब-किताब माँगता है॥ २॥

2अन्त में बहिन भाई कोई भी साथी नहीं बनता।

3वह अपना माल, यौवन एवं धन इत्यादि सबकुछ छोड़कर चल देता है।

4जो कृपालु, पैदा करने वाले, सर्व समर्थ परमात्मा को नहीं जानता, उसे यम तिल की तरह कोल्हु में पीसता है॥ ३॥

5जीव खुशी-खुशी पराई वस्तु को लेता है,

6लेकिन देखने, सुनने वाला खुदा उसके साथ ही है।

7दुनिया के लालच में पड़ कर वह पापों के गड्ढे में गिर गया है और परलोक में होने वाली बात को नहीं जाना॥ ४॥

8इस प्रकार मूर्ख जीव जन्म ले-लेकर मरता है, वह बार-बार मरता एवं जन्मता रहता है।

9वह आवागमन के लम्बे चक्र में बहुत दण्ड प्राप्त करता है।

10जिसने पैदा किया है, अन्धा प्राणी उस परमेश्वर को नहीं जानता और बहुत दुख सहन करता है॥ ५॥

11परमात्मा को भुलाकर जीव लुट गया है।

12यह दुनिया रूपी खेल तमाशा बहुत बुरा है क्योंकि माया के प्रभाव से जीव कभी रूठता और कभी प्रसन्न होता है।

13उसे कोई सत्यनिष्ठ संतोषी संत नहीं मिलता इसलिए वह अपनी इच्छानुसार चलता है॥ ६॥

14अल्लाह मौला खुद ही सब खेल करता है। किसी को मुक्ति प्रदान करता है और कोई संसार-सागर की लहरों में फंस जाता है।

15जैसे-जैसे वह नचाता है, वैसे ही वे नाचते हैं, प्रत्येक जीव के साथ उसके मुकद्दर अनुसार बीत रही है॥ ७॥

16यदि मालिक मेहर कर दे तो ही जीव ध्यान करता है और

17संतों की संगति में रहने से नरक में नहीं जाना पड़ता।

18नानक कहते हैं कि हे परमात्मा ! यदि नामामृत का दान मिल जाए तो नित्य तेरे गुणों के गीत गाता रहूँ॥ ८॥ २॥ ८॥ १२॥ २०॥

19मारू सोलहे महला १

20ੴ सतिगुर प्रसादि॥

21केवल ईश्वर ही सत्य है, अन्य कोई नहीं।

22जिसने यह दुनिया बनाई है, उसने ही इसे नाश किया है।

23हे परमेश्वर ! जैसे तुझे मंजूर है, वैसे ही सबने रहना है और तेरे आगे कोई बहाना नहीं चल सकता॥ १॥

24वह स्वयं ही पैदा करता है और स्वयं ही नष्ट कर देता है,

25स्वयं ही जीवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगाता है।

26वह गुणों का सागर स्वयं ही विचार करता है और स्वयं ही सन्मार्ग लगाता है॥ २॥

27वह स्वयं ही चतुर है और स्वयं ही देखने वाला है।

28वह स्वयं ही सगुण रूप पैदा करके प्रसन्न होता है।

29पवन, पानी एवं अग्नि भी वह स्वयं ही है और स्वयं ही मिलाता है॥ ३॥

30वह स्वयं ही चाँद एवं सूरज है, और सर्वकला सम्पूर्ण है।

31ज्ञान-ध्यान में लीन रहने वाला शूरवीर गुरु भी वही है।

32जिसने परमसत्य ईश्वर में ध्यान लगाया है, उसे मृत्यु एवं यम-जाल भी प्रभावित नहीं करता॥ ४॥

33पुरुष एवं नारी के रूप में स्वयं ही है,

34वह स्वयं चौपड़ का खेल एवं स्वयं ही गोटियां है।

35परमात्मा ने स्वयं ही यह धरती रूपी अखाड़ा बनाया है, जिसमें समूचा जगत्-खेल रहा है और स्वयं जीव रूपी खिलाड़ियों को शुभाशुभ कर्म का फल देता है॥ ५॥

36भेंवरा, फल-फूल, वृक्ष,

37जल, भूमि, सागर एवं सरोवर सब उसका ही रूप है।

38हे परमेश्वर ! तेरा रूप जाना नहीं जा सकता, तू ही मत्स्यावतार, कच्छपावतार और सारी रचना रचने वाला है॥ ६॥

39दिनं एवं रात वही है और

40वह स्वयं ही गुरु के वचनों अर्थात् वाणी से प्रसन्न होता है।

41उसकी मर्जी से युगों-युगान्तरों से दिन-रात घट-घट में उसका अनाहत शब्द गूंज रहा है॥ ७॥

42वह स्वयं ही अनुपम अमूल्य नाम रूपी रत्न है।

43वह स्वयं ही बुरे-भले को परखता है और स्वयं ही पूरा तोलता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं