गुरु ग्रंथ साहिब 101 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1जो कोई भी इस हरि-रस का पान करता है, वह प्रसन्न हो जाता है।
2जो नाम रस को प्राप्त कर लेता है, वह अमर हो जाता है।
3नाम की निधि उसको मिलती है, जिसके हृदय में गुरु की वाणी वास करती है॥२॥
4जिसने भी हरि रस को पाया है, वह तृप्त हो गया है।
5जो व्यक्ति हरि-रस का स्वाद प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी डगमगाता नहीं।
6भगवान का हरि नाम उसे ही प्राप्त होता है, जिसके मस्तक पर भाग्य विद्यमान होता है।॥३॥
7परमात्मा अकेले गुरु के हाथ लगा है, जिससे बहुत ही लाभ प्राप्त करते हैं।
8उससे संगति करके बहुत सारे लोग मुक्त हो जाते हैं।
9नाम की निधि गुरदेव से ही प्राप्त होती है। हे नानक ! उस नाम-निधि के विरले पुरुषों ने ही दर्शन किए हैं।॥४॥ १५॥२२॥
10माझ महला ५ ॥
11हरि-परमेश्वर का हरि-नाम ही मेरी निधियाँ, सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ हैं।
12गहरे एवं गम्भीर ईश्वर की दया से मुझे दुर्लभ मनुष्य जन्म मिला है।
13जो प्राणी गुरु की चरण-सेवा में लगा है, वह लाखों, करोड़ों खुशियाँ एवं आनन्द भोगता है॥१॥
14गुरु के दर्शन करके प्राणी पवित्र हो जाता है
15और वह अपने भ्राताओं एवं सज्जनों को बचा लेता है।
16गुरदेव की दया से मैं अपने अगम्य, अगोचर व महान सत्य परमात्मा का चिन्तन करता हूँ॥२॥
17जिस भगवान की उसके उत्पन्न किए हुए समस्त जीव खोज करते रहते हैं, उसके दर्शन कोई विरला भाग्यशाली ही प्राप्त करता है।
18प्रभु का निवास सर्वोच्च, अपार एवं अगोचर है तथा गुरु ने मुझे प्रभु निवास के दर्शन करवा दिए हैं॥३॥
19हे प्रभु ! तू गहरा और गम्भीर है, तेरा नाम अमृत रूप है।
20जिसके हृदय में प्रभु वास करता है, वह मुक्त हो जाता है।
21हे नानक ! गुरदेव ने जिनके समस्त बन्धन काट दिए हैं, वह सहज ही प्रभु में विलीन हो जाता है॥ ४ ॥ १६ ॥ २३ ॥
22माझ महला ५ ॥
23प्रभु की कृपा से मैं हरि-परमेश्वर का ध्यान करता हूँ।
24प्रभु की दया से मैं उसका मंगल गायन करता हूँ।
25उठते-बैठते, सोते और जागते सब अवस्थाओं में हमें हरि का ध्यान करना चाहिए॥१॥
26संतों ने मुझे नाम रूपी औषधि प्रदान की है।
27इसने मेरे समस्त पाप काट दिए हैं और मैं पवित्र हो गया हूँ।
28मैरी सारी पीड़ा दूर हो गई है और मेरे कष्ट मिट गए हैं तथा बड़ा आनंद प्राप्त हो रहा है॥२॥
29मेरा प्रियतम प्रभु जिसकी सहायता करता है, वह संसार सागर से मुक्त हो जाता है।
30जिस व्यक्ति ने गुरु को सत्य रूप में समझ लिया है, वह मृत्यु से क्यों भयभीत हो ॥३॥
31जब से मैंने साधु की संगति प्राप्त की है, तब से गुरु को मिलने से अहंकार का भूत दूर हो गया है।
32हे प्रभु ! श्वास-श्वास से नानक परमात्मा की कीर्ति गायन करता है। सतिगुरु ने मेरे पाप ढांप लिए हैं।॥४॥१७ ॥२४॥
33माझ महला ५ ॥
34भगवान अपने सेवकों से ताने-बाने की तरह मिला रहता है।
35सुखदाता परमेश्वर अपने सेवकों का पालन करता है।
36हे ईश्वर ! जो भक्त तेरे भजन में लीन हैं, मैं उनके घर पानी ढ़ोता, पंखा करता एवं चक्की से आटा पीसता हूँ॥१॥
37हे परमात्मा ! आपने मेरी वासना रूपी फाँसी को काट मुझे अपनी सेवा में प्रवृत्त कर लिया है।
38इसलिए प्रभु का हुक्म सेवक के मन को अच्छा लगता है।
39सेवक वही कर्म करता है जो प्रभु के मन को भला लगता है। इसलिए सेवक भीतर-बाहर सेवा करने में परिपक्व हो जाता है॥२॥
40हे प्रभु ! तुम बुद्धिमान स्वामी हो और समस्त युक्तियों में सर्वज्ञ हो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं