सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1018 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1जो व्यक्ति लकड़ी से बनी हुई नाव को पैरों तले दबा कर उसमें बैठ गया है, उसके शरीर की थकावट दूर हो गई है।

2महासागर ने भी कोई विघ्न पैदा नहीं किया और एक क्षण में ही सागर के तट पर जा उतारा है॥ २॥

3धरती की चन्दन, अगर, कपूर के लेपन एवं सुगन्धि से कोई प्रीति नहीं,

4यदि कोई विष्ठा, मूत्र फेंकता व खोदकर तिल-तिल भी कर देता है तो वह अपने मन में घृणा नहीं करती (वैसे ही संतजन सहिष्णु हैं)॥ ३॥

5सब को सुख देने वाला आकाश रूपी छत्र सबके संग संबंध बनाकर रखता है, चाहे कोई ऊँची अथवा निम्न जाति का है कोई बुराई अथवा भलाई करने वाला है।

6वह किसी को अपना मित्र अथवा शत्रु नहीं समझता अपितु सबको एक समान मानता है (वैसे ही संतों के लिए सब एक समान हैं)॥ ४॥

7सूर्य अपना प्रचण्ड प्रकाश करके प्रगट हो जाता है और अंधकार मिट जाता है,

8उसकी किरणें सभी पवित्र-अपवित्र जीवों को स्पर्श करती हैं परन्तु उसके मन में इस बात का कोई दुख नहीं होता (वैसे ही संतजन सूर्य की मानिंद हैं)॥ ५॥

9शीतल एवं सुगन्धित वायु मन्द-मन्द सब स्थानों पर समान रूप में बहती है।

10जहाँ कहीं भी कोई अच्छा-बुरा जीव होता है, वहाँ ही उसे छूती है और तिल भर संकोच नहीं करती (वैसे ही संत मानवता का कल्याण करते हैं)॥ ६॥

11अच्छे-बुरे स्वभाव वाला जो भी व्यक्ति अग्नि के निकट आता है, उसकी शीत दूर हो जाती है।

12अग्नि अपने पराए के भेद को कुछ भी नहीं जानती और सहज-स्वभाव विचरण करती है (वैसे ही संत सबका भला करते हैं)॥ ७॥

13जो इनकी चरण शरण में आ जाता है, उसे अवलम्य मिल जाता है और उसका मन प्रियतम के रंग में रंगा रहता है।

14हे नानक ! प्रभु कृपालु हो गया है, नित्य उसका गुणगान करो॥ ८॥ ३॥

15मारू महला ५ घरु ४ असटपदीआ

16ੴ सतिगुर प्रसादि॥

17हृदय रूपी ऑगन में प्रभु का प्रकाश ही सबसे बड़ी चाँदनी है॥ १॥

18अगर आराधना करनी है तो ईश्वर की करो, यही सफल आराधना है॥ २॥

19(अगर त्यागना है तो) मन में से काम, क्रोध एवं लोभ का त्याग करो, यही सबसे बड़ा त्याग है॥ ३॥

20सबसे बड़ी माँग गुरु से हरि-यश माँगना है॥ ४॥

21जागने में जागरण हरि-संकीर्तन में जागना है॥ ५॥

22गुरु-चरणों में मन को लगाना ही सर्वोत्तम लगन है॥ ६॥

23जिसके माथे पर उत्तम भाग्य होता है, उसे ही इस युक्ति की प्राप्ति होती है॥ ७॥

24हे नानक ! जो प्रभु की शरण में आ जाता है, उसके लिए सब कुछ अच्छा होता है॥८॥१॥४॥

25मारू महला ५॥

26हे संतजनो ! मेरे घर में आओ, कानों में भगवान का यश सुनाओ॥ १॥ रहाउ॥

27तुम्हारे आने से मन-तन खिल जाता है और तुम्हारे संग मिलकर ईश्वर का ही गुणगान करना है॥ १॥

28संतों की कृपा से हृदय में सत्य स्थित होता है और द्वैतभाव मिट जाता है॥ २॥

29भक्तों की दया से बुद्धि आलोकित हो जाती है और दुर्मति के सब दुख दूर होते हैं।॥ ३॥

30संतों के दर्शन एवं भेंट से ही जीवन-आचरण पावन होता है और गर्भ-योनि से छुटकारा हो जाता है॥ ४॥

31जो तुम्हारे मन को है, उसे नौ निधियाँ, ऋद्धियों, सिद्धियाँ हासिल हो जाती हैं॥ ५॥

32संतों के बिना मेरा अन्य स्थान नहीं और अन्य स्थान जाना भी नहीं सूझता॥ ६॥

33मुझ निर्गुण को कोई बचाने वाला है, इसलिए संतों के संग ही रहना है॥ ७॥

34हे नानक ! गुरु ने कौतुक दिखा दिया है, अब में ही प्रभु-दर्शन से सुख मिल गया है॥ ८॥ २॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं