गुरु ग्रंथ साहिब 1016 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1नाम के बिना मनुष्य का जीवन यू व्यर्थ है, जैसे बंजर भूमि में बोई फसल है, दरिया के तट पर पेड़ हैं और वहाँ सफेद वस्त्र धारण किए हुए हैं जहाँ कालिमा उड़-उड़कर वस्त्रों पर पड़ती हो।
2यह संसार तृष्णा का घर है, जो इसके भीतर प्रवेश करता है, वह गर्व में जल जाता है। ६ ।
3राजा और प्रजा सभी कहाँ हैं ? जो भी राजा-प्रजा इन दोनों की श्रेणी में हैं, वे नाशवान हैं।
4नानक कहते हैं कि जो सच्चे गुरु की नाम रूपी सीढ़ी पा लेता है, वह प्रभु-चरणों में ही रहता है।॥ ७॥ ३॥ ११॥
5मारू महला ३ घरु ५ असटपदी
6ੴ सतिगुर प्रसादि॥
7जिसके मन में प्रेम बसा देता है,
8वह सहज ही सच्चे शब्द में समाया रहता है।
9यह प्रेम-वेदना वही (ईश्वर) जानता है, अन्य कोई इसका उपचार नहीं जानता॥ १॥
10ईश्वंर स्वयं ही संगति में मिलाकर साथ मिला लेता है और
11स्वयं ही अपना प्रेम लगाता है।
12हे परमेश्वर ! प्रेम की कद्र वही जानता है, जिस पर तुम्हारी कृपा-दृष्टि हो जाती है॥ १॥ रहाउ॥
13उसके भीतर दिव्य-दृष्टि उदित होने से सब भ्रम निवृत्त हो जाते हैं और
14गुरु की कृपा से मोक्ष प्राप्त होता है।
15जो गुरु के शब्द का चिंतन करता है, वही योगी इस युक्ति को पहचान लेता है॥ २॥
16संयोग से ही जीव-स्त्री एवं पति-परमेश्वर का मिलन होता है।
17गुरु-मतानुसार जीव-स्त्री अन्तर्मन में से दुर्मति को दूर कर देती है और
18बड़े प्रेम से पति-प्रभु के संग रंगरलियाँ मनाती रहती है॥ ३॥
19सतगुरु के बिना कोई वैद्य नहीं है और
20वह स्वयं पावन स्वरुप है।
21यदि सतगुरु मिल जाए तो मन में से बुरा आचरण मिट जाता है और जीव ज्ञान का विचारवान् बन जाता है।॥ ४॥
22जिसे शब्द गुरु में प्रवृत्त कर देता है,
23वह गुरुमुख बनकर तृष्णा की भूख को दूर कर देता है।
24भगवान की कृपा से ही कल्याण होता है, अन्यथा अपने आप करने से कुछ भी हासिल नहीं होता॥ ५॥
25जब सतगुरु ने वेदों शास्त्रों का रहस्य बतलाया तो
26जीव प्रभु की कृपा से अपने सच्चे घर में आ गया।
27हे ईश्वर ! जिन पर तुम्हारी कृपा-दृष्टि हो गई है, उसने कालिमायुक्त जगत् में रहते हुए परम-सत्य को पहचान लिया है॥ ६॥
28जो गुरुमुख बन जाता है, वह तत्व-ज्ञान को प्राप्त कर लेता है और
29अपने मन में से आत्माभिमान को मिटा देता है।
30अपने मन में विचार कर देख लो, सतगुरु की शरण बिना सभी लोग दुनिया के धंधों में ही ग्रस्त हैं॥ ७॥
31कुछ अहंकारी व्यक्ति भ्रम में भटकते रहते हैं और
32किसी ने गुरुमुख बनकर अहम् को मिटा दिया है।
33वैरागी सच्चे शब्द में ही प्रवृत्त रहते हैं लेकिन अन्य मूर्ख लोग भ्रम में ही भटकते रहते हैं।॥ ८॥
34जिसने गुरु के सान्निध्य में नाम प्राप्त नहीं किया,
35उस मनमुख ने जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया है।
36आगे परलोक में नाम के बिना कोई भी साथी नहीं होता लेकिन इसकी सूझ गुरु-उपदेश से ही होती है।॥ ९॥
37हरि का नामामृत सदैव सुख देने वाला है और चारों
38युगों में पूर्ण गुरु द्वारा इस तथ्य की सूझ हो सकती है।
39नानक कहते हैं कि हे प्रभु ! जिसे तू देता है, वही तेरा नाम प्राप्त करता है, मैंने तो यही ज्ञान चिंतन किया है॥ १०॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं