सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1015 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1निस्संकोच कितने ही पदाथों के स्वाद चखती रहूँ, कितने ही सुन्दर पहनावे धारण करती रहूँ,

2परन्तु प्रभु के बिना यौवन व्यर्थ है, उससे बिछुड़ी चिंताग्रस्त रहती हूँ॥ ५॥

3गुरु के ज्ञान-विचार द्वारा सच्चे प्रभु का सच्चा उपदेश सुनना चाहिए।

4जब सच्चे की प्रेम भरी कृपा-दृष्टि हो जाती है तो जीव-स्त्री का आचरण सत्य-सा हो जाता है और वह उसके प्रेम में ही लीन रहती है॥ ६॥

5ज्ञानी व्यक्ति देखने के लिए सत्य का अञ्जन लगाकर ईश्वर को ही देखता है।

6अगर गुरमुख बनकर अहम् अभिमान का निवारण किया जाए तो सत्य को बूझा एवं जाना जा सकता है॥ ७॥

7हे पति-परमेश्वर ! जो जीव-स्त्रियों तुझे प्रिय हैं, वह तो तुझ जैसी ही सुन्दर हैं परन्तु मुझ जैसी अनेक (दुहागिन) हैं।

8हे नानक ! जो प्रभु-प्रेम में रत रहती हैं, उनका कदापि वियोग नहीं होता॥ ८॥ १॥ ६॥

9मारू महला १॥

10बहन, भाभी एवं सास कोई भी सदा नहीं रहती,

11किन्तु गुरु जिन (सत्संगी) सखियों को ईश्वर से मिला देता है, उनका सच्चा रिश्ता कभी नहीं टूटता॥ १॥

12मैं अपने गुरु पर कुर्बान हूँ और सदैव कुर्बान जाती हूँ,

13गुरु के बिना इधर-उधर भटक कर थक गई थी, लेकिन गुरु ने मुझे पति-प्रभु से मिला दिया है॥ १॥ रहाउ॥

14फूफी, नानी, मौसी, देवरानी, जेठानी-

15ये नातेदार जन्म लेकर आते एवं मृत्यु को प्राप्त होकर चले जाते हैं, ये सदैव के लिए हमारे साथ नहीं रहते और इन रिश्तेदारों के समूह वर्ग यहाँ से चले जाते हैं।॥ २॥

16माम-मामी, भाई, पिता-माता, ये नातेदार भी हमारे संग सदैव नहीं रहते,

17इन अतिथियों के काफिले लदे हुए जा रहे हैं और भवसागर रूपी दरिया में बहुत भीड़ लगी हुई है॥ ३॥

18हे सखी ! हमारा पति-प्रभु बड़ा रंगीला है और सत्य के रंग में ही रत रहता है।

19जो जीव-स्त्री परमेश्वर की स्मृति में लीन रहती है, उसका सत्य से कभी वियोग नहीं होता॥ ४॥

20वे समस्त ऋतुएँ अच्छी हैं, जिनमें सत्य से प्रेम होता है।

21जिस जीव रूपी नारी ने परमात्मा को पहचान लिया है, वह सदैव सुखी रहती है॥ ५॥

22भवसागर रूपी दरिया के तट पर खड़ा गुरु रूपी मल्लाह पुकार पुकार कर जीव रूपी मुसाफिरों को कह रहा है कि दौड़कर नाम रूपी जहाज में सवार होकर पार हो जाओ।

23सतगुरु के जहाज में चढ़कर भवसागर में से पार होते अनेक प्राणियों को मैंने स्वयं देखा है॥ ६॥

24किसी ने सत्य रूपी सौदा लाद लिया है, कुछ सत्य का सौदा लादकर पार हो गए हैं। लेकिन कुछ जीव पापों का भार लादकर भवसागर में डूब गए हैं।

25जिन्होंने सत्य का व्यापार किया है, वे सच्चे प्रभु के संग रहते हैं।॥ ७॥

26न हम खुद को अच्छा कहते हैं, न ही कोई बुरा दिखाई देता है।

27हे नानक ! जिसने अभिमान को मिटा दिया है, वह सत्य जैसा ही बन गया है॥ ८॥ २॥ १०॥

28मारू महला १॥

29मैं नहीं मानता कि कोई मूर्ख अथवा कोई चतुर है।

30मैं तो सदैव परमात्मा के रंग में लीन हूँ और उसका नाम-स्मरण करता रहता हूँ॥ १॥

31हे बाबा ! मैं मुर्ख तो परमात्मा के नाम पर बलिहारी जाता हूँ।

32हे ईश्वर ! तू विश्व का रचयिता है, तू ही चतुर है और तेरे नाम से ही मुक्ति संभव है॥ १॥ रहाउ॥

33मूर्ख एवं चतुर एक ही है, उनके नाम ही दो हैं किन्तु ज्योति एक ही है।

34जो ईश्वर में निष्ठा नहीं रखता, वह महामूर्ख है॥ २॥

35गुरु के द्वारा ही नाम (का भेद) प्राप्त होता है और सच्चे गुरु के बिना प्राप्त नहीं होता।

36यदि सतगुरु की रज़ा से मन में नाम स्थित हो जाए तो रात-दिन उस में ही ध्यान लगा रहता है।॥ ३॥

37राज्य करने वाले शासक, रंगरलियां मनाने वाले, सौन्दर्य सम्पन्न, धनवान, यौवन सम्पन्न एवं जुआरी-

38ये सभी परमात्मा के हुक्म में जगत् रूपी चौपड़ की खेल में गोटियों के रूप में खेल खेलते रहते हैं।॥४॥

39जग में खुद को चतुर-सयाना समझने वाला व्यक्ति भी भ्रम में भूला हुआ है। यद्यपि वह नाम का पण्डित है किन्तु वह गंवार केवल ग्रंथ ही पढ़ता रहता है।

40कोई प्रभु-नाम को भुलाकर वेदों का अध्ययन करता है, जिसका लेखक स्वयं माया रूपी विष में भूला हुआ है॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं