सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1014 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1फिर उसे तृष्णा की भूख लग गई, वह धन-दौलत को पाने के लिए भागता है पर माया के मोह ने उससे मोक्ष-पदार्थ छीन लिया॥ ३॥

2वह धन के लिए मेहनत-मशक्कत करता है। परन्तु उसे उतना धन प्राप्त नहीं होता जितनी इच्छा करता है। फिर वह इधर-उधर ढूंढ कर थक जाता है।

3वह काम, क्रोध एवं अहंकार में ग्रस्त रहता है और मिथ्या कुटम्ब से प्रेम करता है॥ ४॥

4वह मृत्यु के घर इस जगत् में स्वादिष्ट पदार्थ खाकर व् वस्त्र पहनकर लोगों को दिखाता है।

5शब्द गुरु के बिना वह आत्म ज्ञान को नहीं पहचानता और परमात्मा के नाम बिना उसका काल नहीं टलता॥ ५॥

6जितना अधिक मोह एवं अभिमान करता है, उतना ही भटकता है और ‘मेरी-मेरी' करता हुआ खत्म हो जाता है।

7हजारों चिंता से उसका तन-धन नाश हो जाता है और फिर वह पछताता है परन्तु उसके मुँह में धूल ही पड़ती है॥ ६॥

8अब जब वह बूढ़ा हो गया तो शरीर निर्बल और यौवन का अंत हो गया। बलगम खांसी से गला रुक गया और ऑखों से नीर बहने लग गया।

9पैर चलने से रह गए हैं और हाथ थर-थर कॉपने लगे हैं। लेकिन अफसोस अभी भी विमुखी जीव के ह्रदय में राम नाम याद नहीं आता॥ ७॥

10बूढ़ा होकर उसकी होश नष्ट हो गई और उसके काले केश अब सफेद हो गए हैं। परिवार में से कोई भी उसे घर में रखना नहीं चाहता।

11परमात्मा के नाम को भूलने से उसे ऐसे दोष लग जाते हैं और यमदूत उसे पीटकर नरक में ले जाते हैं।॥ ८॥

12दरअसल पूर्व जन्म में किए कर्मों का लेख कभी नहीं मिटता। इसी कारण वह जन्मता-मरता है, इसलिए किसी अन्य को क्यों दोष दिया जाए ?

13गुरु के बिना जीना व्यर्थ एवं मृत्यु के समान है। शब्द गुरु के बिना जन्म जलता रहता है॥ ९॥

14मनाने एवं पदार्थों के रस भोगने से मनुष्य तंग ही हुए हैं और खोटे कर्मों ने मन में विकार ही पैदा किए हैं।

15नाम को भुलाकर लालच में फँसकर उसने मूल ही गंवा दिया और यमपुरी में उसके सिर पर यमराज का डण्डा पड़ता है॥ १०॥

16जिस पर भगवान की कृपा-दृष्टि हो जाती है, वह गुरु के माध्यम से राम-नाम का ही गुणगान करता है।

17ऐसे निर्मल पुरुष अपरंपार हैं और गोविंद गुरु का ही रूप बन जाते हैं।॥ ११॥

18ईश्वर को याद करो, गुरु के वचन को हृदय में धारण करो, भक्तजनों की संगति से प्रेम करो।

19सत्य के द्वार पर गुरु भक्तजनों का प्रधान होता है। हे नानक ! हम भी उनकी चरणरज हैं।॥ १२॥ ८॥

20ੴ सतिगुर प्रसादि॥

21मारू काफी महला १ घरु २॥

22आवागमन में पड़कर दुविधाग्रस्त जीव-स्त्री कितने ही मित्र बनाती है।

23पति-परमेश्वर से विछुड़ कर उसे कहीं ठिकाना नहीं मिलता, तब उसे कैसे धैर्य हो सकता है॥ १॥

24मेरा मन अपने प्रभु के संग लीन है,

25उसने थोड़ी-सी कृपा-दृष्टि करके आनंदित कर दिया है, अतः मैं खण्ड-खण्ड होकर उस पर न्योछावर जाती हूँ॥ १॥ रहाउ॥

26मैं दुहागिन अब तक अपने पीहर (इहलोक) में बसती रही, अब मैं अपने ससुराल (परलोक) कैसे जाऊँ ?

27मेरे गले में अनेक अवगुण पड़े हुए हैं, पति के बिना मैं अवगुणों से ठगी गई हूँ और झूर-झूर कर मर रही हूँ॥ २॥

28यदि पीहर में अपने पति-प्रभु का स्मरण करूँ तो ससुराल में निवास मिल सकता है।

29जिस सुहागिन ने गुणनिधि प्रभु को पा लिया है, वही सुखी रहती है।॥ ३॥

30चाहे वह अपने सोने के लिए लेफ व रेशमी बिस्तर और शरीर में पहनने के लिए रेशमी पोशाक ही बना ले,

31जिस दुहागिन को पति-प्रभु ने छोड़ दिया है, उसकी जीवन-रात्रि दुखों में ही व्यतीत होती है॥ ४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं