गुरु ग्रंथ साहिब 1013 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1गुरु के बिना उसके अन्तर्मन में से तृष्णाग्नि नहीं बुझती किन्तु बाहर वह धूनेियों तापता है।
2गुरु की सेवा के बिना भक्ति नहीं होती फिर वह अन्तरात्मा को कैसे पहचान सकता है।
3अन्तरात्मा में ऐसे लगता है कि वह पराई निंदा कर-करके नरक में पड़ गया है।
4अड़सठ तीर्थों पर भटक कर भ्रम में ही ख्वार होता है, उसके पापों की मैल कैसे उतर सकती है॥ ३॥
5वह खाक छानकर शरीर पर विभूति लगा लेता है किन्तु माया का मार्ग देखता रहता है।
6वह अन्दर बाहर ईश्वर को नहीं जानता परन्तु सच्चाई बताने पर क्रोधित होता है।
7उस निगुरे की मति ऐसी है कि वह पाठ भी पढ़ता है किन्तु मुँह से झूठ ही बोलता रहता है।
8वह प्रभु नाम का जाप नहीं करता तो फिर भला सुख कैसे पा सकता है, नाम विहीन कैसे सुन्दर लग सकता है॥ ४॥
9किसी ने अपना सिर मुंडवा लिया है, किसी ने अपने सिर पर जटा को बाँध लिया है, कोई मौनी बनकर रहता है, परन्तु मन में अभिमान बना रहता है।
10आत्म-ज्ञान में रंगे बिना मन विचलित होता है और दसों दिशाओं में भटकता है।
11वह माया का दीवाना नामामृत को छोड़कर महाघातक माया रूपी विष पान करता रहता है।
12उसका कर्म नहीं मिटता, न ही ईश्वरेच्छा को बूझता है और पशु समान ही माना जाता है॥ ५॥
13कोई कापड़िया साधु बन गया है, हाथ में उसने कमण्डल पकड़ लिया है किन्तु मन में भारी तृष्णा पैदा हो गई है।
14अपनी स्त्री को छोड़कर कामवासना में फंस गया और पराई नारी में चित लगा लिया।
15वह लोगों को शिक्षा तो देता है परन्तु खुद ब्रह्म-शब्द को नहीं पहचानता और ऐसा लम्पट बाजारी बन जाता है।
16मन में तो तृष्णा रूपी विष है पर बाहर से शान्ति धारण की हुई है अतः यम उसे ख्यार करता है॥ ६॥
17वास्तव में वही संन्यासी है, जो सतगुरु की सेवा करता है और मन से अभिमान को मिटा देता है।
18वह वस्त्र-भोजन की आशा नहीं करता पर जो कुछ उसे बिना सोचे ही मिल जाता है, उसे ले लेता है।
19वह व्यर्थ बकवास एवं बातें नहीं करता, वह क्षमा रूपी धन संचित करता है और नाम से अपने क्रोध को जला देता है।
20जो भगवान के चरणों में मन लगाता है, वह गृहस्थी, संन्यासी एवं योगी प्रशंसा का पात्र है॥ ७॥
21संन्यासी वही है जो जीवन की आशाओं को छोड़ कर विरक्त रहता है और एक ईश्वर में ध्यान लगाता है।
22जब वह हरिनामामृत का पान करता है तो ही उसे शान्ति प्राप्त होती है और अपने सच्चे घर में समाधि लगाता है।
23गुरमुख बनकर वह सच्चाई को बूझ लेता है, जिससे उसका मन नहीं डोलता और चंचल मन को काबू कर लेता है।
24वह गुरु-मत द्वारा अपने शरीर-घर को खोजता है और नाम रूपी पदार्थ को पा लेता है॥ ८॥
25ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर जैसे सर्वश्रेष्ठ देवते नाम का चिंतन करने में ही रत रहते हैं।
26हे अखिलेश्वर ! चारों स्रोतों, चारों वाणियों, आकाश, पाताल, सब में तेरी ही ज्योति व्याप्त है।
27सर्व सुख एवं मुक्ति हरिनामोच्चारण में ही है, अतः सच्चा नाम हृदय में बसा लिया है।
28हे नानक ! ईश्वर के नाम बिना किसी का छुटकारा नहीं होता, सच्चे नाम से ही संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है॥ ६॥ ७॥
29मारू महला १॥
30माता-पिता के संयोग द्वारा रक्त एवं वीर्य के मिलन से शरीर बना था।
31माँ के गर्भ में उलटे पड़े जीव की सत्य में लगन लगी हुई थी, वह परमात्मा ही देखभाल करता एवं देता है॥ १॥
32संसार रूपी सागर से कैसे पार हुआ जा सकता है?
33यदि गुरु के सान्निध्य में पावन-नाम प्राप्त हो जाए तो अभिमानी जीव का पापों का भार दूर हो जाता है।॥ १॥ रहाउ॥
34हे ईश्वर ! मैं बावला क्या करूँ ? मुझ अपराधी को तेरे सब उपकार भूल गए हैं।
35तू दयालु दाता है और दिन-रात देते हुए देखभाल करता है॥ २॥
36मानव ने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की इच्छा लेकर जन्म लिया था, पर जीव रूपी शिव ने माया रूपी शक्ति के घर में वास कर लिया।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं