सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1012 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji

1गुरु की सेवा से सदा सुख प्राप्त होता है, पर सेवा भी वही करता है, जिससे हुक्म मनवाता है॥ ७॥

2सोना-चांदी इत्यादि सब धातुएँ अन्ततः मिट्टी में ही मिल जाती हैं।

3सतगुरु ने यही रहस्य बताया है कि प्रभु नाम के अतिरिक्त कुछ भी साथ नहीं जाता।

4हे नानक ! वही निर्मल हैं जो नाम-स्मरण में रत हैं और सत्य में ही विलीन रहते हैं। ८॥ ५॥

5मारू महला १॥

6ईश्वरेच्छा से अगर मौत का बुलावा आ गया तो इस सच्चाई को मान लो कि अब संसार में नहीं रहना है।

7यह मन अवगुणों में बंधा हुआ है, इसलिए मनुष्य दुखों को सहता है।

8यदि पूर्ण गुरु से क्षमादान पाया जाए तो सब गुनाह छूट जाते हैं। १॥

9(जब मृत्यु अटल है) एक न एक दिन हर किसी ने जग से चले जाना है तो सदैव कैसे रहा जा सकता है ? शब्द-गुरु द्वारा चिंतन करके रहस्य को समझ लो।

10हे ईश्वर ! जिसे तू मिलाता है, वही मिलता है, तेरा हुक्म अटल है॥ १॥ रहाउ॥

11जैसे तू (सुख-दुख में) रखता है, वैसे ही रहता हूँ, जो तू देता है, वही खाता हूँ।

12जैसे तू चलाता है, वैसे ही चलता हूँ, मुँह से तेरा नामामृत जपता रहता हूँ।

13मेरे ठाकुर जी के हाथ में सब बड़ाईयों हैं, साथ मिला लो, मन में यही चाव है॥ २॥

14परमात्मा द्वारा पैदा किए गए जगत की क्यों प्रशंसा करें ? वास्तव में वही सबकी देखभाल करता है।

15जिसने पैदा किया है, वही मन में बसता है, उसके अलावा अन्य कोई महान नहीं।

16उस परमसत्य ईश्वर की प्रशंसा करनी चाहिए, तो ही सच्चा सम्मान मिलता है॥ ३॥

17पण्डित अनेक ग्रंथों का अध्ययन करके भी अपने लक्ष्य (सत्य) तक नहीं पहुँचता, अपितु दुनिया के जंजालों में ही उलझा रहता है।

18पाप एवं पुण्य में फॅसकर यम एवं माया की भूख उसे दुखी करते रहते हैं।

19जिसे पूर्ण प्रभु बचाने वाला है, उसे वियोग एवं भय भूल जाता है।॥ ४॥

20जिनकी सेवा-भक्ति सफल होती है, वही पूर्ण संत हैं।

21पूर्ण संत की मति भी पूर्ण होती है, उसे ही सच्ची बड़ाई मिलती है।

22ईश्वर सदैव देता रहता है, जिसमें कोई कमी नहीं आती किन्तु जीव ले लेकर थक जाते हैं।॥ ५॥

23यदि खारे समुद्र में ढूँढने से कोई एक मोती मिल भी जाए तो

24वह दो-चार दिन ही सुन्दर लगता है, आखिरकार उस मोती को मिट्टी निगल जाती है।

25यदि सत्य के सागर गुरु की सेवा की जाए तो कोई कमी नहीं आती॥ ६॥

26जो मेरे प्रभु को प्रिय लगते हैं, वही उज्ज्वल हैं एवं अन्य सभी पापों की मैल से भरे हुए हैं।

27पापों से मलिन हुआ जीव तभी उज्ज्वल होता है, जब वह गुरु रूपी पारस से मिलकर नामामृत से भीग जाता है।

28सत्य रूपी लाल का नाम-रंग उसे ऐसा चढ़ जाता है कि उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता॥ ७॥

29वेश धारण करने, तीथों में स्नान एवं दान पुण्य से भी सत्य प्राप्त नहीं होता।

30वेदों का पाठ् करने वाले पण्डितों से पूछ लो, इस सत्य को न मानने वाली दुनिया ही लुट रही है।

31हे नानक ! जिसे पूर्ण गुरु ज्ञान प्रदान करता है, वही नाम-रत्न की सही कीमत कर सकता है॥ ८॥ ६॥

32मारू महला १॥

33स्वेच्छाचारी जीव जोश में घर-बार त्याग कर भटकता फिरता है और दूसरों के घर देखता है।

34वह गृहस्थ धर्म का पालन नहीं करता, सतगुरु से उसकी भेंट नहीं होती। अतः वह दुर्मति के भैवर में ही फँसा रहता है।

35वह देश-दिशांतर भटकता है, धर्मग्रंथों के पाठ-पढ़-पढ़कर मायूस हो जाता है, जिससे उसकी तृष्णा में और भी वृद्धि हो जाती है।

36वह नश्वर शरीर शब्द के भेद को नहीं जानता और पशु की तरह पेट भरता रहता है॥ १॥

37हे बाबा ! सन्यासी का जीवन-आचरण ऐसा होना चाहिए कि

38गुरु के शब्द द्वारा उसकी परमात्मा में लगन लगी रहे और हरि-नाम में रत रहकर तृप्त हो जाए॥ १॥ रहाउ॥

39वह गेरु रंग घोलकर भगवे वस्त्र धारण कर लेता है और वेष रचकर भिखारी बन जाता है।

40वह कपड़े फाड़कर गोदड़ी बनाकर धन पाने के लिए गले में झोली डाल लेता है।

41वह स्वयं तो घर-घर जाकर भिक्षा माँगता है किन्तु जग के लोगों को धर्मोपदेश देता है। मन के अन्धे ने अपना सम्मान ही गंवा दिया है।

42भ्रम में भूला हुआ ब्रह्म-शब्द का भेद नहीं जानता, इस तरह उसने अपनी जीवनबाजी जुए में हार दी है॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं