गुरु ग्रंथ साहिब 1010 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1माया ने संसारी धंधों में व्यस्त जगत् को बन्धनों में बाँध लिया है परन्तु यह सत्य-विचार को नहीं बूझता।
2मनमुखी जीव जन्म-मरण को भुलाकर मूर्ख एवं गंवार बना हुआ है।
3जिन्होंने सच्चे शब्द का चिंतन किया है, गुरु ने उनकी रक्षा की है और उनका छुटकारा हो गया है॥ ७॥
4शरीर रूपी पिंजरे में बैठा जीव रूपी तोता प्रभु-प्रेम के वही बोल-बोलता है, जो बोल गुरु बोलता है।
5वह नाम रूपी सच्चा चोगा चुगता है और नामामृत पान करता है। वह शरीर रूपी पिंजरे में से एक बार ही उड़ता है अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।
6हे नानक ! यदि गुरु मिल जाए तो परमात्मा की पहचान हो जाती है और मोक्ष उपलब्ध हो जाता है॥ ८॥ २॥
7मारू महला १॥
8शब्द से मृत्यु को मारो; मृत्यु से भागकर किधर जाओगे ?
9जिसके डर से सब भय भाग जाते हैं, उसका नाम अमृत है।
10हे ईश्वर ! मारने-बचाने वाला केवल तू ही है, तेरे अलावा अन्य कोई नहीं है॥ १॥
11हे बाबा ! मैं मैला, झूठा एवं मतिहीन हूँ,
12पूर्ण गुरु ने यह पूर्ण उपदेश दिया है कि नाम के बिना कुछ भी नहीं॥ १॥ रहाउ॥
13मैं अवगुणों से भरा हुआ हूँ, मुझमें कोई शुभ गुण नहीं है, गुणों के बिना भला सच्चे घर कैसे जा सकता हूँ।
14सहजावस्था में शब्द द्वारा मन में सुख उत्पन्न होता है, परन्तु भाग्य के बिना सच्चा धन प्राप्त नहीं होता।
15जिनके मन में नाम अवस्थित नहीं होता, वे यम द्वार में बंधे हुए कष्ट भोगते रहते हैं।॥ २॥
16जिन्होंने प्रभु-नाम को विस्मृत कर दिया है, वे क्योंकर दुनिया में आए हैं,
17उन्हें लोक-परलोक कहीं भी सुख उपलब्ध नहीं होता, उन्होंने अपने ठेले पाप रूपी राख से लाद लिए हैं।
18जिसका सत्य से वियोग हो जाए उसका पुनः मिलाप नहीं होता और वह यम के द्वार पर बहुत दुख भोगता है॥ ३॥
19हे ईश्वर ! मैं नहीं जानता कि आगे मेरे साथ क्या होगा ? मुझ भूले हुए को तू ही सूझ प्रदान कर।
20मुझ भूले हुए को जो सन्मार्ग बताएगा, मैं उसके चरणों में लग जाऊँगा।
21गुरु के बिना अन्य कोई दाता नहीं और उसकी कीमत ऑकी नहीं जा सकती।॥ ४॥
22यदि मैं अपने साजन के दर्शन कर लूं तो उसे आलिंगन होकर मिलूंगा, उस सच्चे ने भाग्य में लिखा है।
23हे जीव-स्त्री ! तू मुँह लटका कर क्यों खड़ी है, गुरु के माध्यम से पति-प्रभु को अपनी ऑखों से देख।
24हे प्रभु! यदि तुझे उपयुक्त लगे तो मन में आ बसता है और तेरी कृपा-दृष्टि हो जाती है॥ ५॥
25जो स्वयं भूखा-प्यासा भटकता रहता है, उससे क्या माँगा जाए जो वह दे सकता है।
26मन-तन में बसने वाले पूर्ण परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं सूझ रहा, वही सबकुछ देता है।
27जिसने बनाया है, उसने ही देखरेख की है, वह स्वयं ही बड़ाई देता है॥ ६॥
28काया रूपी नगरी का स्वामी नवनूतन है और उसकी जगत् रूपी अद्भुत लीला बाल-लीला के समान है।
29वह सच्चा परमात्मा बड़ा चतुर एवं अति सुन्दर है, वह न नारी है, न पुरुष है और न कोई पक्षी है।
30जो उसे मंजूर है, वही होता है। हे परमेश्वर ! तू ही सूर्य रूपी दीपक है और तू ही चन्दन रूपी सुगन्धि है॥ ७॥
31जिन्होंने बेकार के गीत सुने हैं, पदार्थों के स्वाद चखे हैं, इन व्यर्थ स्वादों ने उनके मन में रोग पैदा कर दिया है।
32जो सत्य से प्रेम करता है, सदा सत्य बोलता है, उसके सब शोक-वियोग मिट जाते हैं।
33हे नानक ! परमात्मा का नाम कभी विस्मृत न हो; जो उसे मंजूर है, वही होगा।॥ ८॥ ३॥
34मारू महला १॥
35सच्चा कार्य करना चाहिए, क्योंकि अन्य सब लालच बेकार हैं।
36यह मन सत्य ने मोह लिया है और जिह्म सत्य के स्वाद में ही लीन रहती है।
37प्रभु-नाम के बिना कोई आनंद नहीं, ज्ञानहीन लोग विकार रूपी विष लादकर जगत् से चले जाते हैं।॥ १॥
38हे मेरे मालिक ! मेरी विनती सुनो; मैं तेरा ऐसा आज्ञाकारी गुलाम हूँ,
39तू जैसे हुक्म करता है, वैसे ही पालन करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
40तेरा ही आदेश है और इस गुलाम ने दिन-रात तेरी ही चाकरी करनी है।
41मैंने गुरु के वचनों द्वारा अपना मन उसे बेच दिया है, शब्द गुरु द्वारा मन को धैर्य हो गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं