गुरु ग्रंथ साहिब 100 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1जब संतों के चरणों की धूल मेरे माथे में लगी,
2तब मेरी खोटी बुद्धि और कुबुद्धि लुप्त हो गई।
3हे नानक ! अब मैं सत्य घर में बसता हूँ और परमात्मा का यशोगान ही करता हूँ। मेरे अन्तर्मन से मेरा झूठ भी नाश हो गया है॥४॥११॥१८॥
4माझ महला ५ ॥
5हे इतने महान दानशील प्रभु ! मैं तुझे कदापि विस्मृत न करूँ।
6इसलिए मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मेरा मन तेरे भक्तों के प्रेम में मग्न रहे।
7हे प्रभु! जिस तरह तुझे अच्छा लगे, मुझे यह दान दीजिए कि दिन-रात मैं तेरा ही सिमरन करता रहूँ॥१॥
8जीवों के शरीर ज्ञानहीन मिट्टी के बने हुए हैं और इन शरीरों में चेतन सुरति समाई हुई है।
9हे प्रभु ! तू जीवों को सबकुछ देता है। तू जीवों को रहने के लिए अच्छे स्थान देता है
10और ये जीव विभिन्न प्रकार के विलास, विनोद, आश्चर्यमयी कौतुक एवं मनोरंजन प्राप्त करते हैं। जो कुछ तुझे भाता है, वही होता है॥२॥
11(उस परमात्मा को स्मरण करो) जिस भगवान का दिया हुआ हम सब कुछ ले रहे हैं
12और छत्तीस प्रकार के भोजन खा रहे हैं।
13हमें सुखदायक सेज सोने के लिए मिल रही है, हम शीतल पवन का आनंद लेते हैं तथा विलासपूर्ण क्रीड़ाएँ करते हैं।॥३॥
14हे प्रियतम प्रभु ! मुझे वह बुद्धि दीजिए, जो तुझे विस्मृत न करे।
15मुझे ऐसी मति प्रदान करो जिससे मैं तेरा ही ध्यान करता रहूँ।
16हे प्रभु ! अपने प्रत्येक श्वास से मैं तेरा यशोगान करता हूँ। नानक ने गुरु के चरणों की शरण ली है॥४॥१२॥१९ ॥
17माझ महला ५ ॥
18हे प्रभु ! तेरी महिमा-स्तुति करना ही तेरे हुकम एवं इच्छा को मानना है।
19जो तुझे अच्छा लगता है, उसे भला समझना ही ज्ञान एवं ध्यान है।
20जो पूज्य प्रभु को भाता है, वही जप है, उसकी इच्छा में रहना ही पूर्ण ज्ञान है॥१॥
21हे प्रभु ! तेरा नाम अमृत है परन्तु इस नाम को वहीं गाता है, जो तेरे मन को प्यारा लगता है।
22तुम संतों के हो और संत तुम्हारे हैं। हे स्वामी ! संतों का चित तुझ में माना हुआ है।॥२॥
23हे ईश्वर ! तुम संतों का पालन करते हो।
24हे गोपाल ! संत तेरे साथ प्यार की खेल खेलते हैं।
25तुझे अपने संत अति प्रिय हैं। तुम अपने संतों के प्राण हो।॥३॥
26मेरा मन उन संतों पर कुर्बान जाता है,
27जिन्होंने तुझे पहचान लिया है और जो तेरे मन को अच्छे लगते हैं।
28उनकी संगति में रहकर मैंने सदैव सुख पा लिया है। हे नानक ! हरि रस का पान करके मैं तृप्त एवं संतुष्ट हो गया हूँ॥ ४ ॥ १३ ॥ २० ॥
29माझ महला ५ ॥
30हे परमेश्वर ! तुम जलनिधि हो और हम जल में रहने वाली तेरी मछलियाँ हैं।
31तेरा नाम वर्षा की बूंद है और हम प्यासे पपीहे हैं।
32तुम ही मेरी आशा हो और मुझे तेरे नाम रूपी अमृत का पान करने की प्यास लगी हुई है। मुझ पर ऐसी कृपा करो ताकि मेरा मन तुझ में ही लीन हुआ रहे॥१॥
33जिस तरह बालक दुग्धपान करके तृप्त होता है,
34जैसे एक निर्धन दौलत मिल जाने पर प्रसन्न होता है,
35जैसे प्यासा पुरुष शीतल जल पान करके शीतल हो जाता है वैसे ही मेरा यह मन भगवान के प्रेम में भीग गया है॥२॥
36जिस तरह दीपक अंधेरे में प्रकाश कर देता है,
37जिस तरह अपने पति का ध्यान करने वाली पत्नी की आशा पूरी हो जाती है,
38जिस तरह प्राणी अपने प्रियतम से मिलकर प्रसन्न होता है, वैसे ही मेरा यह मन भगवान के प्रेम में मग्न हो गया है॥३॥
39संतजनों ने मुझे प्रभु के मार्ग लगा दिया है।
40संतों की कृपा से मेरा मन भगवान से मिल गया है।
41भगवान मेरा स्वामी है और मैं भगवान का सेवक हूँ। हे नानक ! गुरदेव ने मुझे सत्य नाम का दान दिया है॥४॥१४॥२१॥
42माझ महला ५ ॥
43भगवान का अमृतमयी नाम सदैव ही निर्मल रहता है।
44भगवान सुख देने वाला और दुखों का नाश करने वाला है।
45हे मेरे मन ! तूने अन्य स्वाद चखकर देख लिए हैं परन्तु हरि-रस ही सबसे मीठा है॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं