गुरु ग्रंथ साहिब 1009 · Raag Maaroo · Guru Nanak Dev Ji
1ईश्वर का पाठ करो, उसे ही समझो, गुरु-मतानुसार हरि-नाम का जाप करने से ही उद्धार होता है,
2पूर्ण गुरु का उपदेश पूर्ण है, जो पूर्ण शब्द का चिंतन करता है।
3हरि-नाम ही अड़सठ तीर्थ का स्नान है, जो सब पापों को काटनेवाला है॥ २॥
4अंधा अज्ञानी जीव माखन की लालसा करता है, पर वह जल विलोता है और जल का ही मंथन करता रहता है।
5यदि गुरु उपदेश रूपी दही का मंथन किया जाए तो सुखों की निधि नामामृत प्राप्त होता है।
6मनमुखी जीव पशु के समान है, जो नाम-तत्व से अनभिज्ञ है॥ ३॥
7अहम् में लीन रहने वाला जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।
8यदि गुरु के शब्द द्वार मरे तो उसकी मुक्ति हो जाती है।
9यदि गुरु-मतानुसार जग का जीवन परमेश्वर मन में वास कर जाए तो समूची वंशावलि का उद्धार हो जाता है। ४॥
10प्रभु का नाम ही सच्चा सौदा है और इस सौदे का व्यापार ही सच्चा है,
11संसार में प्रभु का नाम-स्मरण ही सच्चा लाभ है परन्तु इस तथ्य का ज्ञान गुरु-मतानुसार ही होता है।
12द्वैतभाव में कोई कार्य करने से संसार में निरंतर क्षति होती रहती है॥ ५॥
13जो व्यक्ति अच्छी संगत, पावन स्थान एवं सच्चे घर-बार में रहता है। वहाँ वह हरि-नाम रूपी सच्चा भोजन ही ग्रहण करता है, सत्य में ही आस्था रखता है और सत्य नाम ही उसका जीवनाधार होता है।
14सच्ची वाणी द्वारा ही उसे संतोष प्राप्त होता है और वह सच्चे शब्द का चिंतन करता रहता है॥ ६॥
15राज-शासन के ऐश्वर्य-सुख भोगने पर भी दुख-सुख ने जीव को नष्ट कर दिया है।
16बड़ा नाम रखवाने से मनुष्य के गले में अवगुणों का भारी पत्थर पड़ जाता है।
17हे ईश्वर ! मनुष्य भला क्या दे सकता है, केवल तू ही संसार को देने वाला है॥ ७॥
18हे मालिक ! तू अगम्य, अगोचर, अनश्वर एवं अपार है।
19यदि शब्द-गुरु द्वारा तेरे द्वार की तलाश की जाए तो मुक्ति का भण्डार प्राप्त हो जाता है।
20हे नानक ! सच्चा व्यापार करने से मिलाप कभी नहीं टूटता॥ ८॥ १॥
21मारू महला १॥
22विकारों का जहाज लादकर संसार-समुद्र में उतार दिया है।
23इस संसार-समुद्र का कोई किनारा नजर नहीं आता और न ही कोई आर-पार है।
24हाथ में न कोई चप्पू है और न ही कोई इसे चलाने वाला खेवट है और इस सागर का जल बड़ा भयानक है॥ १॥
25हे बाबा, यह जगत् महाजाल में फँसा हुआ है।
26यदि शाश्वत हरिनाम का स्मरण करे तो गुरु कृपा से यह उबर सकता है॥ १॥ रहाउ॥
27सतगुरु जहाज है, शब्द-गुरु पार करवाने वाला है।
28इस जहाज में पवन, अग्नि, जल नहीं है और न ही कोई आकार है।
29वहां शाश्वत हरि-नाम ही भवसागर से पार करवाने वाला है॥ २॥
30गुरुमुख सत्य से लगन लगाकर पार हो गए हैं।
31उनका आवागमन मिट गया है और उनकी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई है।
32गुरु-मतानुसार सहजावरथा उत्पन्न होती है और वे सत्य में ही विलीन रहते हैं।॥ ३॥
33अगर किसी सॉप को पिटारी में डाल दिया जाए तो भी उसके भीतर जहर एवं मन में क्रोध भरा रहता है।
34जीव अपने कर्मो का फल ही भोगता है, इसलिए किसी दूसरे को दोष मत दीजिए।
35अगर कोई जीव गुरु से गारूड़-मंत्र सुन ले, नाम का मनन करे तो उसे संतोष प्राप्त हो जाता है॥ ४॥
36जैसे पानी में जाल अथवा कुण्डी में माँस लगाकर मगरमच्छ को फँसा लिया जाता है,
37वैसे ही दुर्मति के कारण यम की फाँसी में फँसा हुआ जीव पुनःपुनः पछताता है।
38जीव को जन्म-मरण के चक्र की कोई सूझ नहीं होती और किए हुए कमों का फल कभी भी मिटाया नहीं जा सकता॥ ५॥
39ईश्वर ने अहम् रूपी जहर डालकर जगत् को पैदा किया है, परन्तु यदि मन में शब्द स्थित हो जाए तो यह जहर दूर हो जाता है।
40जिसका परम-सत्य में ध्यान लगा रहता है, उसे बुढ़ापा प्रभावित नहीं करता।
41जीवन मुक्त वही कहलवाता है, जिसके मन का अभिमान दूर हो जाता है।॥ ६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं