सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1008 · Raag Maaroo

1मारू महला ५॥

2जग में न कोई वैद्य, न दवाई, न कोई शुभचिंतक एवं न ही कोई बहिन एवं भाई है, केवल एक राम ही सदा सहायक है। १॥

3जिसका किया सब हो रहा है, जो पापों को मैल को धो देता है, उस सर्वेश्वर को मन में याद करो॥ २॥

4जो घट -घट में वास करता है, सर्वव्यापी है, जिसका स्थान हमेशा अटल है॥ ३॥

5जो कहीं आता जाता नहीं है, सबके संग समाया हुआ है, जिसका किया हुआ काम पूर्ण होता है॥ ४॥

6वह भक्तजनों का रखवाला है,

7संतजन उस प्राणाधार को जप कर ही जीते हैं।

8नानक तो सर्वकर्ता समर्थ स्वामी पर सर्वदा कुर्बान है॥ ५॥ २॥ ३२॥

9ੴ सतिगुर प्रसादि॥

10मारू महला ९॥

11प्रभु का नाम सदा सुखदायक है,

12जिसे स्मरण करने से पापी अजामल का उद्धार हो गया और गणिका ने भी मोक्ष प्राप्त कर लिया॥ १॥ रहाउ॥

13जब द्रौपदी को कौरवों की राजसभा में रामनाम स्मरण आया तो

14करुणामय भगवान ने उसका दुख दूर करके अपनी गरिमा में वृद्धि की॥ १॥

15जिस व्यक्ति ने भी कृपानिधि का यशगान किया है, वह उसका सहायक बना है।

16हे नानक ! इसी भरोसे पर मैंने भी भगवान की शरण ले ली है॥ २॥ १॥

17मारू महला ९॥

18हे माँ! अब मैं क्या करूं ?

19चूंकि सारा जन्म विषय-विकारों में ही गंवा दिया लेकिन भगवान् को याद नहीं किया॥ १॥ रहाउ॥

20जब काल ने मेरे गले में फन्दा डाला तो उसने सारी होश भुला दी।

21इस संकट की घड़ी में राम नाम के बिना अन्य कौन मददगार हो सकता है। १॥

22जिस संपति को अपनी मान बैठा था, वह क्षण में ही पराई हो गई है।

23हे नानक ! मन में यही सोच रहा हूँ, भगवान् का यशोगान कभी नहीं किया।॥ २॥ २॥

24मारू महला ९॥

25हे माँ ! मैंने अपने मन का अभिमान नहीं छोड़ा।

26माया के नशे में सारा जन्म बिता लिया है, लेकिन राम के भजन में मन नहीं लगाया॥ १॥ रहाउ॥

27जब यम का दण्ड सिर पर पड़ा तो अज्ञान की निद्रा से जागा।

28अब पछताने से भला क्या हो सकता है ? चूंकि भागकर भी यम से छूट नहीं सकता॥ १॥

29जब मन में यह चिंता पैदा हो गई तो गुरु चरणों से प्रेम लगा लिया।

30हे नानक ! मेरा जन्म तभी सफल हुआ है, जब ईश्वर के यश में रत हुआ॥ २॥ ३॥

31मारू असटपदीआ महला १ घरु १

32ੴ सतिगुर प्रसादि॥

33वेद-पुराण की कथा करने-सुनने वाले अनेक मुनिजन भी हार गए हैं।

34अनेक वेषधारी साधु अड़सठ तीर्थों पर भटकते हुए थक चुके हैं।

35एक परम-सत्य परमेश्वर ही निर्मल है, जिसका ध्यान करके यह मन प्रसन्न होता है॥ १॥

36हे ईश्वर ! तू अजर अमर है, शेष सारी दुनिया चलायमान है।

37जो श्रद्धा भावना से नाम-औषधि लेता है, उसका भारी दुख नाश हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं