गुरु ग्रंथ साहिब 1007 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1हे मेरे मन ! हृदय में प्रभु नाम को धारण करो;
2अन्य सबकुछ भुलाकर मन-तन से भगवान से प्रीति करो॥ १॥ रहाउ॥
3यह आत्मा, मन, तन, प्राण सब ईश्वर की देन है, इसलिए तू अपना अहम् त्याग दे।
4हे नानक ! गोविंद का भजन करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और कभी भी निराश नहीं होना पड़ता॥२॥४॥२७॥
5मारू महला ५॥
6हे जीव ! अहं-भावना त्याग दो, हर प्रकार की तकलीफ मिट जाएगी, इसलिए साधुओं की चरणरज बन जाओ।
7हे परमात्मा ! तेरा नाम उसे ही प्राप्त होता है, जिसे तू कृपा करके देता है॥ १॥
8हे मेरे मन ! नामामृत का पान करो;
9अन्य तुच्छ स्वाद भुला दो और अमर होकर युग-युग जीओ॥ १॥ रहाउ॥
10जिसकी प्रभु-नाम से लगन लगी रहती है, उसके लिए केवल नाम ही पदार्थों के तमाम रस एवं दुनिया के रंग हैं।
11हे नानक ! एक ईश्वर को ही मैंने अपना मित्र, साजन, सखा एवं बंधु बनाया है॥ २॥ ५॥ २८॥
12मारू महला ५॥
13जो माता के उदर में जीव का प्रतिपालन करता है, कोई दुख-दर्द नहीं लगने देता,
14वही स्वामी इहलोक में रक्षा करता है, अपनी विवेक बुद्धि से इस तथ्य को समझ लो॥ १॥
15हे मेरे मन ! प्रभु-नाम का सहारा लो;
16जिसने तुझे बनाया है, उसे समझो, केवल एक परमात्मा ही रचयिता है॥ १॥ रहाउ॥
17सब ढोंग एवं चतुराईयों छोड़कर मन में भगवान को याद करो।
18हे नानक ! सदैव परमात्मा की उपासना करो; जिसे स्मरण करके अनेक जीव भवसागर से तैर गए हैं॥ २॥ ६॥ २९॥
19मारू महला ५॥
20जिसका नाम पतितपावन है, जो अनाथ जीवों का नाथ है,
21संसार-सागर में से पार करवाने के लिए तुलहा है, उसे ही मिलता है, जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य लिखा होता है॥ १॥
22प्रभु-नाम के बिना अनेक काफिले भवसागर में डूब गए हैं,
23जो हाथ देकर रक्षा करता है, वह स्रष्टा उन्हें याद ही नहीं आता। रहाउ
24साधुओं की सभा में भगवान का गुणगान ही नामामृत को पाने का मार्ग है।
25नानक विनय करते हैं कि हे ईश्वर ! कृपा करो, ताकेि तेरी कथा सुनकर जीता रहूँ॥ २॥ ७॥ ३०॥
26मारू अंजुली महला ५ घरु ७
27ੴ सतिगुर प्रसादि॥
28(आत्मा-परमात्मा का) संयोग एवं वियोग ईश्वरेच्छा से ही निश्चित हुआ है।
29पाँच तत्वों से मानव-शरीर बनाया और
30फिर ईश्वर के हुक्म से जीव आकर शरीर में प्रवेश कर गया।॥ १॥
31जहाँ माता के गर्भ में भट्टी की तरह अग्नि जलती थी,
32यह जीव वहाँ घोर अंधेरे में उलटे मुँह पड़ा हुआ था।
33उसने श्वास-श्वास से ईश्वर को याद किया और वहाँ मालिक ने उसे विपत्ति में से बचा लिया था॥ २॥
34जब माता के गर्भ में से बाहर निकलकर आया अर्थात् जन्म हुआ तो
35उसने भगवान को भुलाकर दुनिया के साथ चित्त लगा लिया।
36परिणामस्वरूप वह जन्मता मरता और अनेक योनियों में भटकता रहता है, और उसे किसी भी स्थान पर निवास नहीं मिला। ३ ।
37मेहरबान रब ने स्वयं ही उसे बचा लिया है चूंकि
38सभी जीव-जन्तु उसके ही पैदा किए हुए हैं।
39हे नानक ! जो अपने दुर्लभ जन्म की बाजी को जीतकर यहाँ से गया है, उसका ही जन्म लेना मंजूर हुआ है।४॥ १॥ ३१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं