गुरु ग्रंथ साहिब 1006 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji
1हे मोहन, हे देव ! तू अलक्ष्य, अपरंपार, अटल एवं अनश्वर है।
2नानक वंदना करते हैं कि मुझे संतों की संगत एवं भक्तजनों की चरण-धूल का दान उपलब्ध हो॥ ४॥ ६॥ २२॥
3मारू महला ५॥
4वे संतजन तृप्त एवं संतुष्ट हो गए हैं,
5जिन्होंने गुरु का मंत्र जान लिया है।
6उसकी महिमा व्यक्त नहीं की जा सकती
7जिसे नाम की वड़ाई मिली है॥ १॥
8मेरा प्यारा प्रभु अमूल्य रत्न है,
9जिसका नाम अतुल्य एवं गंभीर है॥ १॥ रहाउ॥
10जिसका मन ईश्वर के साथ लीन हो गया है,
11उस गुरुमुख को परमतत्व का ज्ञान प्राप्त हो गया है।
12उसने अपने मन का अभिमान त्याग दिया है,
13सबको देखते हुए भी उसका भगवान में ध्यान लगा रहता है॥ २॥
14उनका निश्चल ठिकाना बन गया है
15जिन्होंने गुरु द्वारा अपने सच्चे घर को पहचान लिया है ।
16वे गुरु से मिलकर रात-दिन जाग्रत रहते हैं और
17भगवान् की भक्ति में तल्लीन रहते हैं।॥ ३॥
18वे पूर्ण तृप्त एवं संतुष्ट रहते हैं और
19सहज स्वभाव ही समाधिस्थ होकर सत्य में लीन रहते हैं।
20हरि-नाम रूपी भण्डार हाथ में आ गया है,
21हे नानक ! जो की गुरु की कृपा से उपलब्ध हुआ है॥ ४॥ ७॥ २३॥
22मारू महला ५ घरु ६ दुपदे
23ੴ सतिगुर प्रसादि॥
24सब चतुराईयाँ छोड़ दो, साधु महात्मा पुरुषों के साथ मिल कर घमण्ड त्याग दो।
25अन्य सबकुछ झूठा है, इसलिए जीभ से राम-नाम जपो॥ १॥
26हे मन ! कानों से हरि-नाम की स्तुति सुनो;
27इससे तेरे जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाएँगे, फिर बेचारा यम क्या बिगाड़ सकता है॥ १॥ रहाउ॥
28दुख, निर्धनता व भय प्रभावित नहीं करते और सुख शान्ति प्राप्त होती है।
29नानक कहते हैं कि गुरु-कृपा से हरि-भजन करने से ही परमतत्व का ज्ञान होता है।२॥ १॥ २४॥
30मारू महला ५॥
31जिन्होंने हरि-नाम को भुला दिया, उन्हें मिट्टी होते देखा है।
32पुत्र, मित्र एवं पत्नी जिनके साथ मनुष्य विलास करता है, ये सभी स्नेह टूट जाते हैं।॥ १॥
33हे मेरे मन ! नित्य नाम स्मरण करो;
34इससे तृष्णा रूपी अग्नि सागर में नहीं जलना पड़ता और मन-तन को सुख उपलब्ध होता है॥ १॥ रहाउ॥
35जैसे पेड़ की छाया नाश हो जाती है, वायु बादलो को उड़ा ले जाती है, वैसे ही दुनिया की रंगरलियाँ हैं।
36हे नानक ! साधुओं के संग मिलकर भगवान् की भक्ति दृढ़ कर लो, यही तुम्हारे काम आने वाली है॥ २॥ २॥ २५॥
37मारू महला ५॥
38सुख देने वाला पूर्ण परमेश्वर निरंतर भक्तों के अंग-संग रहता है।
39वह जन्म-मरण से रहित है, अनश्वर है और उस पर गर्मी एवं सर्दी का प्रभाव नहीं पड़ता॥ १॥
40हे मेरे मन ! प्रभु-नाम से प्रीति करो:
41मन में हरि-नाम रूपी निधि को याद करो, यही निर्मल जीवन आचरण है। १॥ रहाउ॥
42जो दयालु, कृपालु ईश्वर का नाम जपता है, उसे सर्व सिद्धियाँ उपलब्ध हो जाती हैं।
43हे नानक ! यह मन नवल, नवनूतन, चतुर एवं सुन्दर प्रभु के संग ही बिंध गया है॥ २॥ ३॥ २६॥
44मारू महला ५॥
45हे मानव ! चलते-बैठते, सोते-जागते हरदम हृदय में गुरु-मंत्र को याद करो।
46संतों के संग प्रभु-चरणों का भजन करो, भवसागर से मुक्ति संभव है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं