सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1005 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1हमारे संग हुए तुम्हारे सब वचन झूठे हैं।

2ईश्वर ने माया का भ्रम डालकर स्वयं ही जीव को कुमार्गगामी किया हुआ है।

3हे नानक ! भाग्य को टाला नहीं जा सकता॥ २॥

4वह पशु-पक्षी और भूत-प्रेत इत्यादि

5अनेक योनियों में भटकता है।

6वह जिधर भी जाता है, वहाँ उसे रहने के लिए ठिकाना नहीं मिलता।

7वह स्थानरिक्त होकर बार-बार योनियों में भटकता है।

8उसके मन-तन में वासना का विस्तार बहुत ज्यादा है।

9अभिमान ने बेचारे जीव को ठग लिया है और

10अनेक दोषों के कारण बहुत दण्ड भोगता है।

11उस दण्ड का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

12ईश्वर को विस्मृत करके वह नरक में ही पड़ता है और

13वहां माता, बन्धु एवं पत्नी कोई सहायक नहीं होता।

14हे नानक ! जिस पर भगवान् की कृपा हो जाती है,

15उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है॥ ३॥

16हे प्रभु! अनेक योनियों में भटकते-भटकते तेरी शरण में आया है।

17तू दीनानाथ, जगत् का पिता एवं माता है।

18तू दयालु है और सब दुख-दर्द मिटाने वाला है।

19जिसे तू चाहता है, उसकी मुक्ति हो जाती है।

20संसार रूपी अंधकूप में से तू ही बाहर निकालने वाला है और

21प्रेम-भक्ति द्वारा जीव का निस्तार होता है।

22तूने स्वयं ही साधु-रूप में शरीर धारण किया है और

23स्वयं ही माया रूपी महा अग्नि से बचाया है।

24जप, तप एवं संयम इस जीव से नहीं होता,

25सृष्टि के आदि एवं अन्त में अगम्य, असीम परमेश्वर का ही अस्तित्व है।

26नानक विनती करते हैं कि हे हरि ! तेरा दास तुझसे नाम की ही कामना करता है,

27मेरा प्रभु जीवन प्रदाता है॥ ४॥ ३॥ १६॥

28मारू महला ५॥

29हे लोगो ! क्यों छल कर रहे हो, ईश्वर तो मुझ दीन पर मेहरबान है॥ १॥

30मुझे यह ज्ञान हो गया है कि

31गुरु ही दाता है, शरण में आने वाले की शूरवीर की तरह रक्षा करता है और स्वयं ही कीर्ति प्रदान करता है॥ १॥ रहाउ॥

32भक्तवत्सल होने के कारण वह अपने भक्तों की बात मानने वाला है और सदा ही सुख देने वाला है॥ २॥

33हे भक्तवत्सल ! अपने दास पर कृपा करो कि तेरे नाम का ध्यान करता रहे॥ ३॥

34दीन नानक तेरे नाम की ही कामना करता है ताकि मेरा द्वैत भ्र्म मिट जाए॥ ४॥ ४॥ २०॥

35मारू महला ५॥

36मेरा स्वामी महान् है और

37मैं तो उसका छोटा-सा सेवक हूँ॥ १॥

38मेरा प्रियतम मोहन मुझे मन एवं प्राणों से भी दुलारा है।

39हे प्रियवर ! मुझे नाम दान दीजिए॥ १॥ रहाउ॥

40मैंने सब अवलम्य खोज कर देख लिए हैं

41परन्तु ईश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं है॥ २॥

42वह सब जीवों का पोषण एवं उनकी संभाल करता है।

43वह अब (वर्तमान में) भी है, भविष्य में भी होगा और अतीत में भी वही था॥ ३॥

44नानक कहते हैं कि हे देवाधिदेव ! मुझ पर दया करो ,

45ताकि तेरी उपासना में लगा रहूँ॥४॥५॥२१॥

46मारू महला ५॥

47हे ईश्वर ! तू पतितों का उद्धारक एवं मोक्षदाता है, मैं तुझ पर कोटि कोटि बलिहारी जाता हूँ।

48मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए, जिसके संग तेरा भजन करता रहूँ॥ १॥

49मुझे कोई नहीं जानता, लेकिन तेरा दास कहलाता हूँ,

50यही मेरा आसरा है।॥ १॥ रहाउ॥

51हे जगत्पालक, हे सर्वेश्वर ! मुझ दीन की तुझसे एक विनती है,

52तू अपनी लीला को स्वयं ही जानता है, तू जल है और मैं एक मछली हूँ॥ २॥

53हे स्वामी ! यह जगत् तेरा पूर्ण विस्तार है और बड़ी जिज्ञासा से तेरे पीछे आया हूँ।

54हे प्रभु ! समूचे भूमण्डल एवं ब्रह्माण्ड के खण्डों में तू ही व्यापक है॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं