सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1003 · Raag Maaroo · Guru Arjan Dev Ji

1पण्डित अपने मुख से वेद पढ़ता है किन्तु नाम-अभ्यास करने में आलसी है।

2मौनी एकांत में ध्यान लगाए बैठ जाता है परन्तु उसके हृदय में परेशानियों की गाँठ पड़ी रहती है।

3इन्सान विरक्त बनकर घर-गृहस्थी को छोड़कर चल देता है मगर घर छोड़ने से उसकी तृष्णा का अन्त नहीं होता। १।

4मैं अपने दिल की बात किससे कहूँ?

5ऐसा संत कहाँ से ढूँढ लें, जो स्वयं बन्धनों से मुक्त है और मुझे भी प्रभु से मिला दे। १॥ रहाउ॥

6तपस्वी ने तपस्या करके शरीर की साधना कर ली, परन्तु मन फिर भी दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

7ब्रह्मचारी ने ब्रह्मचार्य तो धारण कर लिया लेकिन उसके हृदय में घमण्ड पैदा हो गया।

8कोई संन्यासी बनकर तीर्थों पर भटकता रहा, पर मन में क्रोध ही भरा रहा, जिसने उसे मूर्ख बना दिया। २॥

9कुछ लोग पैरों में धुंघरू बाँधकर मन्दिरों में नाचने वाले राम के दास बन जाते हैं परन्तु यह काम भी उनका रोटी कमाने का एक साधन है।

10किसी ने व्रत-उपवास रखे, नियम एवं षट कर्म किए, किन्तु यह भी उनका मात्र लोक-दिखावा ही है।

11कुछ लोग मुँह से भजन गाते हैं, नाद बजाते एवं राग अलापते हैं परन्तु मन से हरि-नाम नहीं गाते। ३ ।

12निर्मल जीवन वाले हरि के संतजन खुशी-गम एवं लोभ-मोह से सदैव निर्लिप्त होते हैं।

13यदि भगवंत दया करे तो मेरे मन को उनकी चरण-धूलि प्राप्त हो जाए!

14हे नानक ! जब पूर्ण गुरु से साक्षात्कार हुआ तो मन की सारी चिंता दूर हो गई। ४॥

15मेरा परमेश्वर अन्तर्यामी है,

16वह मेरे दिल की हरेक बात को जानता है, इसलिए बेकार की बातें भूल चुकी हैं॥ १॥ रहाउ दूसरा॥ ६॥ १५॥

17मारू महला ५॥

18हे परमेश्वर ! जिसके हृदय में तेरा नाम है, वह तो लाखों-करोड़ों सब का राजा है।

19परन्तु जिसे मेरे सतगुरु ने नाम प्रदान नहीं किया, वह मूर्ख जन्म-मरण में ही फंसा रहता है। १ ।

20हे मेरे सतगुरु ! तू ही मान-सम्मान रखने वाला है।

21अगर स्मरण आए तो ही पूर्ण सम्मान मिलता है, परन्तु विस्मृत करने से जीव खाक में मिल जाता है। १॥ रहाउ ।

22दुनिया के जितने भी रूप, रंग, खुशियाँ एवं मन के भोगने वाले पदार्थ हैं, यह सभी अवगुण एवं पाप हैं।

23हरि का नाम ऐसी निधि है, जो कल्याणकारी, सुखदायक एवं श्रेष्ठ पदार्थ है॥ २॥

24बादल की छाया की तरह माया के रंग-विरंगे विलास क्षण में ही नाश हो जाते हैं।

25जिन्होंने गुरु से मिलकर भगवान का गुणगान किया है, वे सत्य के गहरे रंग में लीन होकर लाल हो गए हैं। ३॥

26सर्वोपरि, अपरंपार स्वामी का दरबार अगम्य है।

27हे नानक ! प्रभु-नाम की ही बड़ाई एवं शोभा फैली हुई है, वह मालिक अति प्रिय है॥४॥७॥१६॥

28मारू महला ५ घरु ४

29ੴ सतिगुर प्रसादि॥

30ऑकार से समूची उत्पति हुई,

31उसने दिन-रात किया और ,

32वन-वनस्पति, पानी एवं तीन लोकों का निर्माण किया।

33ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद, पैदा करने वाले चार स्रोत-अण्डज, जेरज, स्वेदज, उदभिज,

34धरती के नवखण्ड, सप्तद्वीप एवं चौदह लोक

35सब एक (ओंकार) शब्द से ही उत्पन्न हुए॥ १॥

36हे जीव ! रचनहार ईश्वर को समझो;

37परन्तु यदि सतगुरु मिल जाए तो ही सूझ प्राप्त होती है।१ रहाउ ।

38ईश्वर ने रज, तम एवं सत रूपी त्रिगुणों का जग में प्रसार किया और

39नरक, स्वर्ग एवं अवतारों की सूजना कर दी।

40अहम् के कारण जीव जन्म-मरण के चक्र में पड़ गया और

41उसका मन रत्ती भर समय के लिए भी नहीं टिकता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं